Monday, October 31, 2016

समंदर से भेंट


इस बार समंदर से भेंट करने की तीव्र इच्छा हमें सुदूर पश्चिमी तट दीव तक खींच ले गई।

यह शायद अमिताभ बच्चन की अपील का नतीजा था कि कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में....या फिर कहीं न कहीं जाने की असमंजस में से निकली कोई योजना। खैर, हमने इस बार समंदर देखने की अपनी इच्छा को मरने नहीं दिया। सितंबर का पहला हफ्ता। कुछ सरकारी छुट्टियां और कुछ निजी दोनों को मिलाकर हम निकल पड़े जयपुर से सुदूर दक्षिण पश्चिम की ओर से गुजरात के अहमदाबाद से होते हुए केंद्र शासित दमन दीव के दीव द्वीप में। गुजरात की जमीन की नाल से जुड़ा है यह दीव। लेकिन जैसे गुजरात की जमीन को छोड़कर दीव में प्रवेश करते हैं यह एहसास हो जाता है कि आप अपनी मन मुताबिक जगह पर पहुंच गए हैं। साफ-सुथरी चौड़ी सड़क। सड़क के किनारे समंदर हमारी ओर झांकता हुआ। और हम उसकी ओर निहारते हुए। रेत के आदमी को समंदर इसी तरह प्यार करता है। दीव अरब सागर के समंदर के खारे पानी से तीनों ओर से घिरा हुआ है और इसका जुड़वा हिस्सा दमन यहां से कई मीलों दूर कोंकण तट पर मौजूद है। वहां जाने के लिए अलग से योजना बनानी होगी। अहमदाबाद से अपनी निजी कार से लगभग चार सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर हम दीव में अपने जालंधर बीच पर बुक करवाए राजकीय अतिथि गृह में पहुंच गए। अहमदाबाद से यहां तक बिना सुस्ताए आठ घंटे में पहुंच सकते हैं। सड़कें बेहतरीन हैं गुजरात में। कुछ अंदरूनी मौसमी सड़कों को छोड़ दें तो।

जालंधर बीच। बीच के पास राजकीय अतिथि गृह। अगर बीच के पास रात बिताने का अवसर मिले तो कभी नहीं चूंके। खासकर बच्चे साथ हों तो उनके लिए यह अद्भुत अनुभव होता है। चार जोड़ी हम लोग और ढाई जोड़ी हमारे बच्चे। अतिथि गृहों में अपना सामान ठिकाने लगाकर समंदर देवता से रूबरू होने उसके भीतर घुस गए। गरजता, चिंघाड़ता और उठा-पठक करता हुआ मानों वह बरसों से हमारी राह देख रहा हो, या हम उसकी। कौन निर्णय करे ?  हमें घुटनों तक छूने को कोशिश करता हुआ। पीछे हटकर फिर तेजी से लहरों पर दौड़ता हुआ हमें अपनी आगोश में लेने को तत्पर था। हमें भ्रम था यह हमसे हम बदन होने को लालायित है, मगर ऊपर शुक्ल पक्ष का चंद्रमा न मालूम उसे क्या इशारा कर रहा था। मगर, हम अपने भ्रम में ही उस रात भरपूर उसका दीदार करते रहे। सभी अपने हमराहियों के साथ। जालंधर बीच की पक्की दीवारों पर बैठकर। यात्रा की थकान ने हमें बिस्तरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन उस रात न जाने समंदर क्या बातें करता रहा चांद से। उसके बदन पर टिके व्यापारिक जहाज और नावें अपनी टिमटिमाती मद्धम बत्तियों के साथ झिलमिलाते रहे। सुबह किसी मंजिल की और दौड़ पड़ने के लिए।
इन समंदरों से रूबरू होना है तो आफ सीजन में इनसे मिलिए। आप तफ्सील से इन्हें गुनगुनाते देख सकते हैं। इसलिए हमने भी सितंबर के शुरुआती हफ्ते को चुना। पूरा गुजरात इन दिनों आने वाले दुर्गापूजा के लिए गरबा की तैयारियों में मशरूम था। दीव भी इससे अछूता नहीं था। जगह जगह गरबा की तैयारियां यहां भी हो रही थी। और गणेश विसर्जन में लोग जुटे हुए थे। गणेश चतुर्थी की सवारी में लोगों बॉलीवुड के गानों पर थिरक रहे थे। रास्ते साफ सुथरे, व्यवस्थित यातायात व्यवस्था और करीने से सजी धजी दुकाने। गुजरात की तरह यहां शराब बंदी नहीं है। लिहाजा मदिरालय के शौकीन गुजराती अपनी शामें अक्सर यहां गुजारते नजर आ जाते हैं।
यात्रा के दूसरे दिन की शुरुआत दीव के दूसरे बीच नागोवा के समंदर तट से हुई। रेतीला समंदर तट। सामने खजूर के लंबे पेड़। नारियल पानी के दर्जनों ठेले। तीखी धूप। जलीय खेलों से भरपूर सामग्री। लेकिन सैलानी अपने ही खेल में व्यस्त। कई युवा प्रेमी जोड़े समंदर को साक्षी मानकर अपने प्यार का अफसाना गाते नजर आ रहे थे। बाहों में बाहें डाले समंदर की सैर कर रहे थे। समंदर अपनी उफनती लहरों से सैलानियों को अपने किनारे पर पटक पर उन्हें उनकी औकात को नापने का इशारा करता। लेकिन सैलानी भी कहां ये सब मानने को तैयार होते हैं। हम भी नहीं थे। अपनी औकात से ज्यादा उसे मथते हुए उसमें उतरते जाते। नमकीला पानी जब नथुनों से होकर गले में उतर जाता है तो समंदर के होने का एहसास जीभ पर आ जाता है। जमकर तस्वीरें, सेल्फियां और ग्रुप फोटो उतारकर यहां से इस छोटे से शहर से रूबरू होने के लिए निकल पड़े।
कई सदियां यहां पुर्तगाली शासकों के पदचापों में गुजरी हैं। ऐसे में पुर्तगाली सभ्यता के अंश इस शहर में बिखरे पड़े हैं। खासकर दीव का किला और उसकी बुनावट। पुर्तगालियों ने अपनी भरपूर ऊर्जा और दिमाग इस किले की सुरक्षा में लगाया होगा। किले के अभेद्य बनाने के लिए यह समंदर के किनारे बनाया गया है जिसकी अस्सी फीसदी चार दीवारी को एक गहरी खाई के माध्यम से सुरक्षित किया गया है। किले की दीवारों पर अभी भी उस वक्त के लिखे लेख साफ नजर आते हैं। सामने एक बड़ा सा क्रॉस, ईसाई धर्म का प्रतीक किले के ऊपर दिख जाता है। खंडहर हो रहा यह किला सैलानियों को एक बेहतरीन सुकून देता है। दरअसल यहां से समंदर को उसके पूरे यौवन रूप में देखा जा सकता है। भरा-पूरा। उफनता हुआ। साफ-नीला। चट्टानों से मुठभेड़ करता हुआ। किले की दीवारों पर चिंघाड़ता हुआ।  जैसे कोई पुराना वैर हो। इस छोटे से दरियाई शहर की परिक्रमा कर हम अपनी नई मंजिल की ओर बढ़ गए। लेकिन हां, तीन दिन इस शहर में आसानी से आनंद से गुजारे जा सकते हैं।
सोमनाथ से रूबरू
ऐतिहासिक सोमनाथ। पौराणिक सोमनाथ। देश की आन बान शान का प्रतीक सोमनाथ। समंदर जैसे अंजुली भर भर शिवलिंग पर जल चढ़ाता है। मुख्य मंदिर, जो लौहपुरुष सरदार पटेल के अथक प्रयासों से खड़ा हुआ। उसी भव्य रूप में। उतनी श्रद्धा के साथ।  मंदिर के ठीक दायी ओर ध्वंस अवस्था में अभी भी मौजूद है पार्वती मंदिर। गजनवी और औरंगजेब की कुत्सित चेष्टाओं का प्रतीक। लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल तत्व तक वे कभी नहीं पहुंच पाए। काश पहुंच जाते तो उन्हें इतिहास इस रूप में याद नहीं रखता। इतिहास के खलनायक। सोमवार का दिन था। महादेव के अद्भुत रूप के दर्शन का हम सभी को सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्रद्धालु मंदिर के चारों ओर महादेव में खोये हुए। अंतर्ध्यान। पीछे उफनता हुआ समंदर। महादेव से विदा लेकर हम युगांधर कृष्ण के मोह में खिंचते द्वारिका की ओर बढ़ चले। दरअसल द्वारिका जाने और न जाने को लेकर हमारे बीच मत विभाजन हो गया था। लेकिन हालात ऐसे बने कि बिना द्वारिका गए अहमदाबाद नहीं जाया जा सकता था। लेकिन यह यात्रा काफी मजेदार थी।
माधवपुर कृष्ण-रुक्मणी का विवाह स्थल
सोमनाथ से द्वारिका के बीच, सोमनाथ से लगभग पचहत्तर किलोमीटर दूर और पोरबंदर से पहले। माधवपुर का समंदर किनारा। जैसा नाम से मालूम हो जाता है। यहां भगवान कृष्ण और रुक्मणी का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए इस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर है। साफ-सुथरा समंदर तट। जैसे ही घनी आबादी के कस्बों को छोड़कर सड़क पर आगे बढ़ते जाते हैं अचानक से समंदर फिर से हमसे या हम समंदर से टकरा जाते हैं। लगभग निर्जन, शांत और उफनती लहरें। किसी भी सैलानी का न चाहकर भी यहां उतरकर कुछ पल गुजारने की इच्छा तीव्र हो जाती है। शायद कोई पौराणिक आशीर्वाद का प्रतिफल है। सड़क के किनारे रेतीले हिस्से को पार कर जैसे ही नीचे उतरते हैं विशाल, अथाह जलराशि आंखों में भर जाती है। लहरे जैसे इस समंदर पर किसी धावक की तरह हमारी और दौड़ती आ रही थी। लंबी लंबी फर्लांग भरते हुए। और सड़क किनारे की रेत में आकर जैसे पस्त हो जाती।
यह समंदर तट भगवान कृष्ण से जुड़ा हुआ है। पांच सहस्राब्दी और कुछ सदियां पीछे लौटिए। विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर से शिशुपाल से विवाह को इनकार कर चुकी भीष्मक की पुत्री रुक्मणी को लेकर कृष्ण चार सौ कोस की रथ यात्रा कर यहां रुक्मणी से विवाह कर उन्हें अभयदान देते हैं । विवाह संपन्न कर यहां से बलराम और यादव सेना के साथ पचास कोस द्वारिका अपनी राजधानी पहुंचते हैं।
हम भी समंदर की रेत में अपने पैरों के निशान छोड़कर और यहां की यादों को कैमरों में दर्ज कर द्वारिका की ओर बढ़ दिए। कृष्ण की सेना के पीछे पीछे।
द्वारिका
द्वारिका। भेंट द्वारिका। हिंदुओं के चार धामों में एक । धार्मिक आस्था को छोड़िए। फिर से उस इतिहास की ओर चलते हैं, जिस पर अभी भी काफी शोध किया जाना शेष है। पांच हजार वर्ष पूर्व। समाज में शांति, नागरिकों को आतंक से बचाने और राष्ट्र की पश्चिमी सीमा को मजबूत करने के मकसद से दूरदृष्टा युगांधर श्री कृष्ण ने मथुरा से 655 मील अर्थात तेरह सौ किलोमीटर दूर अनजानी जगह पर समंदर के तट पर अपनी राजधानी की स्थापना की। एक सुरक्षा प्रहरी के रूप में।  क्योंकि उस वक्त भी अरब सागर के उस पार से आज की तरह ही दस्युओं से भरी नावें आने का खतरा मंडराता रहता था। इसके लिए द्वारिका में समंदर के बीच नाविक तैनात रहते थे।  कथित बुद्धिजीवियों ने जिसे महज कल्पना और पौराणिक घटनाक्रम ठहराकर नकारने की कोशिश की, पुरातत्व विशेषज्ञों ने  समंदर के भीतर डूबी द्वारिका की खोजकर उसे समय के सापेक्ष ऐतिहासिक तथ्य में बदल दिया है। द्वारिका स्थित मुख्य मंदिर से महज डेढ़ मील की दूरी पर भेंट द्वारिका। यहीं सुदामा ने दीन हीन दशा में अपने बाल सखा कृष्ण से भेंट की थी। यात्रियों को द्वारिका से भेंट द्वारिका तक ले जाने वाली ज्यादातर नावों के मालिक मुस्लिम है। भेंट द्वारिका में भी मुस्लिम बहुसंख्या में है। इसके बावजूद यहां का सामाजिक ताना-बाना काफी व्यावहारिक है। लोगों की रोजी-रोटी दुकान, नाव और मछली पालन से चलती है।
द्वारिका देश की पश्चिमी सीमा का आखिरी किनारा है। अगर यहां शाम के वक्त पहुंचते हैं तो सबसे पहले सनसैट पॉइंट पहुंचिए। समंदर के सीने में समाते लाल सूर्ख सूरज को देखना दिलचस्प अनुभव है।


यात्रा: समंदर से भेंट


इस बार समंदर से भेंट करने की तीव्र इच्छा हमें सुदूर पश्चिमी तट दीव तक खींच ले गई।

यह शायद अमिताभ बच्चन की अपील का नतीजा था कि कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में....या फिर कहीं न कहीं जाने की असमंजस में से निकली कोई योजना। खैर, हमने इस बार समंदर देखने की अपनी इच्छा को मरने नहीं दिया। सितंबर का पहला हफ्ता। कुछ सरकारी छुट्टियां और कुछ निजी दोनों को मिलाकर हम निकल पड़े जयपुर से सुदूर दक्षिण पश्चिम की ओर से गुजरात के अहमदाबाद से होते हुए केंद्र शासित दमन दीव के दीव द्वीप में। गुजरात की जमीन की नाल से जुड़ा है यह दीव। लेकिन जैसे गुजरात की जमीन को छोड़कर दीव में प्रवेश करते हैं यह एहसास हो जाता है कि आप अपनी मन मुताबिक जगह पर पहुंच गए हैं। साफ-सुथरी चौड़ी सड़क। सड़क के किनारे समंदर हमारी ओर झांकता हुआ। और हम उसकी ओर निहारते हुए। रेत के आदमी को समंदर इसी तरह प्यार करता है। दीव अरब सागर के समंदर के खारे पानी से तीनों ओर से घिरा हुआ है और इसका जुड़वा हिस्सा दमन यहां से कई मीलों दूर कोंकण तट पर मौजूद है। वहां जाने के लिए अलग से योजना बनानी होगी। अहमदाबाद से अपनी निजी कार से लगभग चार सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर हम दीव में अपने जालंधर बीच पर बुक करवाए राजकीय अतिथि गृह में पहुंच गए। अहमदाबाद से यहां तक बिना सुस्ताए आठ घंटे में पहुंच सकते हैं। सड़कें बेहतरीन हैं गुजरात में। कुछ अंदरूनी मौसमी सड़कों को छोड़ दें तो।
जालंधर बीच। बीच के पास राजकीय अतिथि गृह। अगर बीच के पास रात बिताने का अवसर मिले तो कभी नहीं चूंके। खासकर बच्चे साथ हों तो उनके लिए यह अद्भुत अनुभव होता है। चार जोड़ी हम लोग और ढाई जोड़ी हमारे बच्चे। अतिथि गृहों में अपना सामान ठिकाने लगाकर समंदर देवता से रूबरू होने उसके भीतर घुस गए। गरजता, चिंघाड़ता और उठा-पठक करता हुआ मानों वह बरसों से हमारी राह देख रहा हो, या हम उसकी। कौन निर्णय करे ?  हमें घुटनों तक छूने को कोशिश करता हुआ। पीछे हटकर फिर तेजी से लहरों पर दौड़ता हुआ हमें अपनी आगोश में लेने को तत्पर था। हमें भ्रम था यह हमसे हम बदन होने को लालायित है, मगर ऊपर शुक्ल पक्ष का चंद्रमा न मालूम उसे क्या इशारा कर रहा था। मगर, हम अपने भ्रम में ही उस रात भरपूर उसका दीदार करते रहे। सभी अपने हमराहियों के साथ। जालंधर बीच की पक्की दीवारों पर बैठकर। यात्रा की थकान ने हमें बिस्तरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन उस रात न जाने समंदर क्या बातें करता रहा चांद से। उसके बदन पर टिके व्यापारिक जहाज और नावें अपनी टिमटिमाती मद्धम बत्तियों के साथ झिलमिलाते रहे। सुबह किसी मंजिल की और दौड़ पड़ने के लिए।
इन समंदरों से रूबरू होना है तो आफ सीजन में इनसे मिलिए। आप तफ्सील से इन्हें गुनगुनाते देख सकते हैं। इसलिए हमने भी सितंबर के शुरुआती हफ्ते को चुना। पूरा गुजरात इन दिनों आने वाले दुर्गापूजा के लिए गरबा की तैयारियों में मशरूम था। दीव भी इससे अछूता नहीं था। जगह जगह गरबा की तैयारियां यहां भी हो रही थी। और गणेश विसर्जन में लोग जुटे हुए थे। गणेश चतुर्थी की सवारी में लोगों बॉलीवुड के गानों पर थिरक रहे थे। रास्ते साफ सुथरे, व्यवस्थित यातायात व्यवस्था और करीने से सजी धजी दुकाने। गुजरात की तरह यहां शराब बंदी नहीं है। लिहाजा मदिरालय के शौकीन गुजराती अपनी शामें अक्सर यहां गुजारते नजर आ जाते हैं।
यात्रा के दूसरे दिन की शुरुआत दीव के दूसरे बीच नागोवा के समंदर तट से हुई। रेतीला समंदर तट। सामने खजूर के लंबे पेड़। नारियल पानी के दर्जनों ठेले। तीखी धूप। जलीय खेलों से भरपूर सामग्री। लेकिन सैलानी अपने ही खेल में व्यस्त। कई युवा प्रेमी जोड़े समंदर को साक्षी मानकर अपने प्यार का अफसाना गाते नजर आ रहे थे। बाहों में बाहें डाले समंदर की सैर कर रहे थे। समंदर अपनी उफनती लहरों से सैलानियों को अपने किनारे पर पटक पर उन्हें उनकी औकात को नापने का इशारा करता। लेकिन सैलानी भी कहां ये सब मानने को तैयार होते हैं। हम भी नहीं थे। अपनी औकात से ज्यादा उसे मथते हुए उसमें उतरते जाते। नमकीला पानी जब नथुनों से होकर गले में उतर जाता है तो समंदर के होने का एहसास जीभ पर आ जाता है। जमकर तस्वीरें, सेल्फियां और ग्रुप फोटो उतारकर यहां से इस छोटे से शहर से रूबरू होने के लिए निकल पड़े।
कई सदियां यहां पुर्तगाली शासकों के पदचापों में गुजरी हैं। ऐसे में पुर्तगाली सभ्यता के अंश इस शहर में बिखरे पड़े हैं। खासकर दीव का किला और उसकी बुनावट। पुर्तगालियों ने अपनी भरपूर ऊर्जा और दिमाग इस किले की सुरक्षा में लगाया होगा। किले के अभेद्य बनाने के लिए यह समंदर के किनारे बनाया गया है जिसकी अस्सी फीसदी चार दीवारी को एक गहरी खाई के माध्यम से सुरक्षित किया गया है। किले की दीवारों पर अभी भी उस वक्त के लिखे लेख साफ नजर आते हैं। सामने एक बड़ा सा क्रॉस, ईसाई धर्म का प्रतीक किले के ऊपर दिख जाता है। खंडहर हो रहा यह किला सैलानियों को एक बेहतरीन सुकून देता है। दरअसल यहां से समंदर को उसके पूरे यौवन रूप में देखा जा सकता है। भरा-पूरा। उफनता हुआ। साफ-नीला। चट्टानों से मुठभेड़ करता हुआ। किले की दीवारों पर चिंघाड़ता हुआ।  जैसे कोई पुराना वैर हो। इस छोटे से दरियाई शहर की परिक्रमा कर हम अपनी नई मंजिल की ओर बढ़ गए। लेकिन हां, तीन दिन इस शहर में आसानी से आनंद से गुजारे जा सकते हैं।

सोमनाथ से रूबरू

ऐतिहासिक सोमनाथ। पौराणिक सोमनाथ। देश की आन बान शान का प्रतीक सोमनाथ। समंदर जैसे अंजुली भर भर शिवलिंग पर जल चढ़ाता है। मुख्य मंदिर, जो लौहपुरुष सरदार पटेल के अथक प्रयासों से खड़ा हुआ। उसी भव्य रूप में। उतनी श्रद्धा के साथ।  मंदिर के ठीक दायी ओर ध्वंस अवस्था में अभी भी मौजूद है पार्वती मंदिर। गजनवी और औरंगजेब की कुत्सित चेष्टाओं का प्रतीक। लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल तत्व तक वे कभी नहीं पहुंच पाए। काश पहुंच जाते तो उन्हें इतिहास इस रूप में याद नहीं रखता। इतिहास के खलनायक। सोमवार का दिन था। महादेव के अद्भुत रूप के दर्शन का हम सभी को सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्रद्धालु मंदिर के चारों ओर महादेव में खोये हुए। अंतर्ध्यान। पीछे उफनता हुआ समंदर। महादेव से विदा लेकर हम युगांधर कृष्ण के मोह में खिंचते द्वारिका की ओर बढ़ चले। दरअसल द्वारिका जाने और न जाने को लेकर हमारे बीच मत विभाजन हो गया था। लेकिन हालात ऐसे बने कि बिना द्वारिका गए अहमदाबाद नहीं जाया जा सकता था। लेकिन यह यात्रा काफी मजेदार थी।

माधवपुर कृष्ण-रुक्मणी का विवाह स्थल
सोमनाथ से द्वारिका के बीच, सोमनाथ से लगभग पचहत्तर किलोमीटर दूर और पोरबंदर से पहले। माधवपुर का समंदर किनारा। जैसा नाम से मालूम हो जाता है। यहां भगवान कृष्ण और रुक्मणी का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए इस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर है। साफ-सुथरा समंदर तट। जैसे ही घनी आबादी के कस्बों को छोड़कर सड़क पर आगे बढ़ते जाते हैं अचानक से समंदर फिर से हमसे या हम समंदर से टकरा जाते हैं। लगभग निर्जन, शांत और उफनती लहरें। किसी भी सैलानी का न चाहकर भी यहां उतरकर कुछ पल गुजारने की इच्छा तीव्र हो जाती है। शायद कोई पौराणिक आशीर्वाद का प्रतिफल है। सड़क के किनारे रेतीले हिस्से को पार कर जैसे ही नीचे उतरते हैं विशाल, अथाह जलराशि आंखों में भर जाती है। लहरे जैसे इस समंदर पर किसी धावक की तरह हमारी और दौड़ती आ रही थी। लंबी लंबी फर्लांग भरते हुए। और सड़क किनारे की रेत में आकर जैसे पस्त हो जाती।
यह समंदर तट भगवान कृष्ण से जुड़ा हुआ है। पांच सहस्राब्दी और कुछ सदियां पीछे लौटिए। विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर से शिशुपाल से विवाह को इनकार कर चुकी भीष्मक की पुत्री रुक्मणी को लेकर कृष्ण चार सौ कोस की रथ यात्रा कर यहां रुक्मणी से विवाह कर उन्हें अभयदान देते हैं । विवाह संपन्न कर यहां से बलराम और यादव सेना के साथ पचास कोस द्वारिका अपनी राजधानी पहुंचते हैं।
हम भी समंदर की रेत में अपने पैरों के निशान छोड़कर और यहां की यादों को कैमरों में दर्ज कर द्वारिका की ओर बढ़ दिए। कृष्ण की सेना के पीछे पीछे।
द्वारिका
द्वारिका। भेंट द्वारिका। हिंदुओं के चार धामों में एक । धार्मिक आस्था को छोड़िए। फिर से उस इतिहास की ओर चलते हैं, जिस पर अभी भी काफी शोध किया जाना शेष है। पांच हजार वर्ष पूर्व। समाज में शांति, नागरिकों को आतंक से बचाने और राष्ट्र की पश्चिमी सीमा को मजबूत करने के मकसद से दूरदृष्टा युगांधर श्री कृष्ण ने मथुरा से 655 मील अर्थात तेरह सौ किलोमीटर दूर अनजानी जगह पर समंदर के तट पर अपनी राजधानी की स्थापना की। एक सुरक्षा प्रहरी के रूप में।  क्योंकि उस वक्त भी अरब सागर के उस पार से आज की तरह ही दस्युओं से भरी नावें आने का खतरा मंडराता रहता था। इसके लिए द्वारिका में समंदर के बीच नाविक तैनात रहते थे।  कथित बुद्धिजीवियों ने जिसे महज कल्पना और पौराणिक घटनाक्रम ठहराकर नकारने की कोशिश की, पुरातत्व विशेषज्ञों ने  समंदर के भीतर डूबी द्वारिका की खोजकर उसे समय के सापेक्ष ऐतिहासिक तथ्य में बदल दिया है। द्वारिका स्थित मुख्य मंदिर से महज डेढ़ मील की दूरी पर भेंट द्वारिका। यहीं सुदामा ने दीन हीन दशा में अपने बाल सखा कृष्ण से भेंट की थी। यात्रियों को द्वारिका से भेंट द्वारिका तक ले जाने वाली ज्यादातर नावों के मालिक मुस्लिम है। भेंट द्वारिका में भी मुस्लिम बहुसंख्या में है। इसके बावजूद यहां का सामाजिक ताना-बाना काफी व्यावहारिक है। लोगों की रोजी-रोटी दुकान, नाव और मछली पालन से चलती है।
द्वारिका देश की पश्चिमी सीमा का आखिरी किनारा है। अगर यहां शाम के वक्त पहुंचते हैं तो सबसे पहले सनसैट पॉइंट पहुंचिए। समंदर के सीने में समाते लाल सूर्ख सूरज को देखना दिलचस्प अनुभव है।


Saturday, February 27, 2016

उन दिनों

उन दिनों
-    मुरारी गुप्ता



हाथों में लिपटी हुई चिकनी मिट्टी
कि महकते हुए शरबतों की दुकानें
चाक से उतरते दीयों की कतारें
दीयों से उठते खूशबू के बफारें
जेठ महीने की तपिस दुपहरी
कि दूर शहर से आई बर्फ की दुकानें
सिर पर साफा हाथों में भोपू
एक टेर से जी मचल उठता सबका
हरे, पीले, नीले चटक लाल गोले
सभी को चखना सभी को चखाना
चवन्नी का झगड़ा, अठन्नी का रोना
बड़ी मुश्किलों से बाराना होना।
होली का मेला, मेले में चूरण
चंदिया, खील, लड्डू, पपड़ी की दुकानें
लपलपाती नजरें, पर पैसे का रोना
यारों से उधारी, फिर कभी न चुकाना।
बारिश का पानी, टपकती दीवारें
टीन की चादर, चूल्हें की धुआएं
भीगे उपले गीली लकड़ियां
कैसे जलेगा जाने शाम को चूल्हा
मां की पेशानी पर चिंता का होना।
बेफिकरे हम बारिश में छपछप
शाम को आते घर लौटकर तो
मां कहां से जाने रोटी तोड़ लाती
करौंजे का अचार बथुए की भाजी
हमें खिलाती, आखिर में खाती।
टटोलें जरा तो, अंतर को यारां
क्या जिंदा है मां दिल में हमारे
वो नाजुक से लम्हे, हसीं पल सारे
घर के आंगन की मिट्टी मे लिपटी
शरारत की बातें, बारिश की रातें
मां के दो-चार कदम भी मिलेंगे
दिल पे पड़ी रेत हटाकर मिलेंगे
चलो उन लम्हों की वादियों में
आज फिर से जी लें जरा।

27 फरवरी 2016





Wednesday, February 24, 2016

क्यूं सिखलाएं देशप्रेम

क्यूं किसी को देशप्रेम सिखलाएं
उसकी नसों में बह रहा होगा
गर वतन का नमक
वो खुल बोलेगा जयहिंद
तुम कौन?उसे सिखलाने वाले
मस्तिष्क की धमनियों में
सुलगते अलगाव को
ठहरो!
सुलगने दो
जब तक उसकी आंच से
उसका ह्दय नहीं जल उठे
उसके हाथ न कपकपा उठें
आंखों की पुतलियां उल्टी न हो जाए
उसमें चेतना आने दो

वह बोलेगा भारत की जय।

Monday, January 25, 2016


कभी लौटकर आओ राही
-मुरारी गुप्ता

कितने साल हुए तुम्हें
देखे हुए राही
कहां चले गए तुम
सदियां सी बीत गई तुम्हें देखे
कभी तो लौटकर आओ
मेरे पहलू में बैठो
गुनगुनाओं, मुझसे बात करो
कुछ अपनी सुनाना
थोड़ा मैं बताऊंगा
कि कितना बदल गया है
तुम्हारा यह पुश्तैनी गांव।
शरारतें तो कर नहीं पाओगे
बड़े हो गये होगे ना
मैं भी अब बूढ़ा हो गया हूं
काबिल नहीं रहा कि
तुम्हें कुछ दे सकूं
हड्डियों सी मेरी सूखी टहनियां
अब किसी काम की नहीं, भले ही
पर अभी भी अपने पहलू में
भर भर छाव देने को उतावला हूं
मेरे बहुत से अंश भी उभर आए हैं
मेरे चारों ओर
आओ तो देखना तुम
तुम्हारी कहानियां सुनाता हूं उन्हें कभी कभी
तुम भी सुनाते होंगे ना
अपने बच्चों को मेरी कहानियां
याद है तुम्हें
एक बार
बछड़ा खा गया मेरी कोमल टहनियों को
कितना रोये थे तुम उस दिन
फिर उसी के गोबर को कपड़े में लपेट
बांध दिया था मेरे ठूठ से
कि मैं जल्द से बड़ा हो जाऊं
अब तो मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूं
कभी लौटकर देखो तो।
गांव में मेरी छाव तले
तुम्हारे यार जब चर्चा करते हैं
तुम्हारी बहुत याद आती है राही
कभी तो चले आओ
तुम्हें वक्त कहां होगा लेकिन
तुम्हारी शहरी जिंदगी से
दफ्तर, समाज, रिश्ते
बच्चे, बैठक, गपशप
नेट, चैट, व्हाट्सएप
इन सबमें कहां मिल पाएंगे हम
कोई गूगल भी याद नहीं दिलाएगा हमारी
इससे पहले कि गांव के किसी बूढ़े की
अंतिम क्रिया में मेरा अंतिम संस्कार हो
मेरे इन हाड़ो से लिपट भर जाओ राही
सदियां सी बीत गई
कभी तो लौटकर आओ राही।



Sunday, October 25, 2015

फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आंचल:एक यात्रा


फणीश्वरनाथ रेणु के मैले आंचल, जोगबनी की यात्रा का हाल। सितंबर महीने (2015) के शुरुआती हफ्ते मे घूमने, फिरने के मकसद से जोगबनी जाना हुआ। यहां हमारे ब्रदर इन ला प्रणेशजी कस्टम में सहायक आयुक्त के तौर पर नियुक्त हैं। इन्हीं के सौजन्य से यह यात्रा हुई। उस दौरान जोगबनी में जो कुछ देखा, सुना और महसूस किया, उसे आलेख के रूप में तैयार किया, जिसे राजस्थान के प्रमुख हिंदी दैनिक ने अपनी "हम लोग" अंक में प्रमुख स्थान दिया। यहां लिंक भी दिया है, चाहे तो लिंक के जरिेए पढ़ा जा सकता है।

http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/7005788



Friday, October 16, 2015

संदर्भ- साहित्यकारों द्वारा सम्मान वापसी


विरोध के लिए घटनाएं मत चुनिए
-मुरारी गुप्ता
"घटनाओं को नंगी आंखों से देखिए
हरा, नीला, पीला चश्मा उतार फैंकिए
आपके लिए यह उचित नहीं
आपके निरपेक्ष भाव में ही
इस देश की उन्नती है।"

युवा कवि आनंद की ये खूबसूरत पंक्तियां हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों और साहित्यकारों के लिए सबक साबित हो सकती हैं। लेकिन निरपेक्षता का भाव पांच दशक पहले ही खत्म कर दिया गया था।
चलिए बहुत ज्यादा पीछे नहीं जाते। आपातकाल से शुरू करते हैं। देश में घोर आपातकाल का समय था। लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। लगभग इक्कीस महीने तक देश में घटाघोंप अंधेरा रहा। लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लिया गया। पूरा इंटरनेट खंगाल लिया। उस समय के सर्वाधिक चर्चित लेखकों में से किसी ने भी उस वक्त अपना सम्मान लौटाना उचित नहीं समझा। इससे भी आगे आज जो ख्यातनाम साहित्यकार अपने सम्मानों का पूरा भोग कर लौटा रहे हैं, उनका भी कोई बयान या विरोध उस समय किसी अखबार, पत्र-पत्रिका में दर्ज नजर नहीं आता। आगे बढ़ते हैं। साल 1984, सिखों के खिलाफ अभियान चलाया गया। सैकड़ों की संख्या में सिखों को मार दिया गया। कितने अफसोस की बात है कि आज सम्मान लौटा कर अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बन रहे इन लेखकों, साहित्यकारों की आत्मा पर तब क्या पत्थर पड़ चुके थे। वे सोए रहे और बौद्धिक जुगाली में मस्त रहे। साहित्य अकादमी तो तब भी थी। सम्मान तब भी दिए जा रहे थे। लेकिन शायद तब इन साहित्यकारों तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान का यह फैसला उचित लगा होगा। चलिए फिर आगे बढ़ते हैं।
भोपाल में युनियन कार्बाइड प्लांट के गैस रिसाव की घटना तो याद होगी। यह भी याद होगा कि इस घटना में भोपाल में लाखों की संख्या में सोते-सोते बेकसूर मारे गए। हमारे प्रिय लेखक थोड़ा दिमाग पर जोर डालेंगे तो उन्हें इस घटना के शिकार मृत बच्चे की वह चर्चित तस्वीर जरूर याद होगी जिसमें उसकी देह कंकर-मिट्टी में दबी है और सूनी आंखें न्याय की ओर देख रही हैं। फिर तो यह भी याद होगा कि इस घटना के प्रमुख जिम्मेदार वारेन एंडरसन थे। तब तो हमारे प्यारे साहित्यकारों को यह जरूर याद होगा कि किस तरह एंडरसन को सजा दिलाने की बजाय उसे सत्ता प्रतिष्ठान ने हमारे प्रिय साहित्यकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की आंखों के सामने से चोरी छिपे रातों-रात भगा दिया गया। साल-डेढ़ साल पहले उस एंडरसन ने अपने देश में दीर्घायु जीवन के बाद चैन की मौत पाई। दुर्भाग्यवश उस वक्त भी हमारे प्रिय साहित्यकारों में से किसी को भी यह याद ही नहीं रहा कि इसके विरोध में सम्मान भी लौटाए जा सकते हैं। संयोग देखिए कि उसी वक्त भोपाल में आयोजित विश्व कविता सम्मेलन में इन दिनों अपना सम्मान लौटा कर मुक्त हो चुके एक महान कवि और साहित्यकार ने कहा था- मुर्दों के साथ मरा नहीं जाता। ऐसी महान सोच के साहित्यकार सामूहिक रूप से देश के सम्मान का अपमान करें, तो उसे क्या कहा जाएं।
हमारे देश के इन महान साहित्यकारों को जम्मू, पंजाब, दिल्ली और देश के कोने-कोने में रोजी रोटी के लिए बसे कश्मीरी पंडितों की पीड़ा नजर नहीं आती। उनकी नई पीढ़ियां अपने घरों का रास्ता भूल चुकी है। उन मनों पर क्या गुजरती होगी, जिन्हें बंदूक की नोक पर यह कहकर अपने घरों से भगा दिया गया हो कि अपनी बीबी और जवान लड़कियों को छोड़कर यहां से दफा हो जाओ। पूरे पच्चीस साल हो गए उन्हें अपना घर, मोहल्ला, बस्ती छोड़े हुए। उनकी चार-पांच मंजिले घर खंडहर हो आज भी अपने मालिकों का इंजतार कर रहे हैं। लेकिन यहां बसे मलिक उन्हें आने देंगे, मुमकिन नहीं है। लेकिन यह तो मुमकिन था कि इस घटना के विरोध दो-पांच साहित्यकार, लेखक अपना सम्मान ही लौटा देते। और इन मलिकों का विरोध करते। विरोध तो छोड़िए। इन्हें मौका मिले तो ये अब भी उनकी तारीफ कर देते हैं। देश के बत्तीस हजार से ज्यादा परिवार रातों रात अपने घर से बेदखल कर दिए गए। और इन साहित्यकारों के सम्मानों पर जूं तक नहीं रेंगी। शायद इसलिए कि इसमें कोई मजेदार सेकुलरिज्म नहीं था। जिस घटना में थोड़ा बहुत भी सेकुलरिज्म नहीं, सम्मान लौटाने में वो आनंद कहा। देश के मीडिया की सुर्खियों में आने का कोई चांस नहीं। चलिए और आगे बढ़ते हैं। धारा विशेष के साहित्यकारों का प्रसिद्ध शगल। बाबरी मस्जिद। गुजरात दंगे।
गोधरा की घटना के बाद गुजरात दंगे हुए। इन दंगों में हजारों की संख्या में लोग मारे गए। दोनों समुदायों के लोग मारे गए। इस बड़ी घटना को भी बुद्धीजीवी जज्ब कर गए। उन्हें अपना सम्मान लौटाने का ख्याल उस वक्त भी नहीं आया। और तो और बाबरी मस्जिद ढहाने के वक्त भी इन्हें सम्मान लौटाने की फुर्सत नहीं मिली।
जो जीवन भर दूसरे पक्ष के लेखन को लेकर असहिष्णु रहे वे आज असहिष्णुता को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं। लोकतंत्र के पक्ष में इनकी भावना भी संदेह के घेरे में हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री को लेकर बुद्धीजीवियों, जिसमें आज सम्मान लौटाने वाले भी कुछ साहित्यकार शामिल है, ने बाकायदा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उन्हें वोट नहीं देने की अपील की। लोकतंत्र में उनकी आस्था को इससे समझा जा सकता है।
साहित्यकारों के सम्मान वापसी की एक के बाद एक घटनाओं से इनके पीछे क्या मकसद हो सकता है? किसी के लिए समझना मुश्किल नहीं है। सोचिए जो घटनाएं राज्य के दायरे में हैं, जिन पर राज्य सरकारों की कार्यवाही करनी है, उनके लिए बुद्धीजीवी केंद्र को सिर्फ इसलिए जिम्मेदार ठहरा रहे है, कि उन्हें सरकार के एक खास व्यक्ति से बेइंतहा असहिष्णुता है। क्या लोकतंत्र का यही तकाजा है। घोर आश्चर्य है कि जिस घटना को लेकर इतना हो हल्ला हुआ, उसके सूबे के मुखिया के खिलाफ बुद्धीजिवियों के मुंह से उफ तक नहीं निकला। जैसे देश की हर सांप्रदायिक घटना के पीछे सिर्फ केंद्र की मौजूदा सरकार जिम्मेदार है।
हर सांप्रदायिक घटना का विरोध कीजिए। जमकर कीजिए। लेकिन घटनाओं को चुन चुन कर विरोध मत कीजिए। इससे आम जन के ह्रदय में आपकी जो अनुपम छवि है, वह धूमिल होती है। आपकी मौलिक लेखनी में फिर बू आने लगती है। आपकी कविताएं फिर वो जज्बात पैदा नहीं कर पाती। वे कृत्रिम लगने लगती हैं। आपकी कहानियों के चरित्र संदेश के घेरे में आने लगते हैं।