Monday, October 11, 2010


नमन
अद्भुत, असीम प्रकृति
चिरंतन, सुकुन सुख
हवाएं, हरीतिमा और पहाड़ियां
बादलों की ओट में
लुका-छिपी का खेल
चुपके से सूरज
बादलों के आंचल में
बालक की भांति
निकल मुस्काता
सूरज की किरणें
रेशमी फुहारों के साथ
मंद मंद सी चेहरे पर
ठंडक का एहसास
बांस के लंब कद में
अटकती, अंगड़ाती
पहली किरण
मेरे आंगन में गिरती
ठंडी, रेशमी बूंदों में भींगी
किरण को पलकों पर ले
आदित्य को नमन।

Friday, October 1, 2010

यह कैसा न्याय????


आखिरकार अयोध्या मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपना निणॆय सुना दिया. न्यायालय ने विवादित जगह को तीन हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा वक्फ बोडॆ को दे दिया. अफसोस की बात है कि न्यायालय ने यह मानकर भी वहां मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी, और किसी इस्लामिक सिध्दांत के मुताबिक मस्जिद का निमॆाण उचित नहीं, हिंदुओं के पवित्र स्थल का एक हिस्सा उनको सौंप दिया. सच्चाई तो यही है कि अयोध्या भगवान श्री राम का जन्म स्थल है और सदियों से हिंदुओं का आस्था का तीथॆ है. इस सच्चाई को किसी भी भाई चारे की भावना के बावजूद भुलाया नहीं जा सकता। अभी भी सभी लोग भाई चारे की बात कर रहे, मगर सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं है। युवा पीढ़ी को जिस तरह देश के विभाजन को भुलवाया जा रहा है, उसी तजॆ पर राम मंदिर को भी भुलवाया जा रहा है। आखिर यह देश और यहां के युवा कब तक अपने आत्मगौरव से वंचित होते रहेंगे। और मीडिया....शायद उसका मकसद ही यहां के युवाओं के भीतर के आत्मगौरव को मारने का है।
इन दिनों सभी लोग भाईचारे की बात कर रहे हैं, मगर किसकी कीमत पर है. हिंदुओं की भावनाओं की कीमत पर. भगवान राम के जन्म स्थल की कीमत पर. इस भाईचारे की कीमत को हम ही क्यों भुगते.

Saturday, September 25, 2010

खामोश आवाज-है कोई सुनने वाला



अशांत वादियों की सैर से
तोपें, पत्थर, बंदूकें
सब शांत हो जाएंगे
सब फिर से
मुस्कराने लगेंगे,
अजानों में माना
फिर से चैन की अजान
सुन सकोगे,
मगर उन ददॆों का क्या
जो कैंपों में सिसक रहा है
बचपन से बूढ़ा हो गया
शहर-शहर भटक रहा है
शायद इसलिए कि
वह बंदूक नहीं उठाता
पत्थर नहीं फैंकता
आजादी की बात नहीं करता
है कोई कान वाला
नुमाइंदा,
धड़कते दिल वाला
मदॆ नेता,
संसद मागॆ पर
शायद नजर नहीं आता।
अजान के साथ घड़ियालों की आवाज
एक सपना ही रहेगा।

--हाल में केंद्रीय दल का कश्मीर दौरा

Thursday, September 23, 2010

सेकुलरवादी होने की दौड़ में


श्री राम का डर मूर्त रुप ले चुका था. वो दौर खुद से घृणा का था. क्योंकि भगवान राम तो त्याग के देवता हैं. उन्होंने कभी ख़ून बहाने की बात नहीं की. यहां तक कि उसका खून बहाने से पहले भी उससे बातचीत का प्रस्ताव रखा जो उनकी पत्नी को हर ले गया था.........................
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मैं तो बस इतना कहता हूं काशी और मथुरा में जब मंदिर मस्जिद साथ रह सकते हैं तो अयोध्या में क्यों नहीं...मंदिर भी बने और मस्जिद भी बने. दोनों की दीवारें लगती हों. अज़ान और घंटियां साथ साथ बजें क्योंकि ये दोनों आवाज़ें हम सभी ने एक साथ कहीं न कहीं ज़रुर सुनी होंगी. जिन्होंने नहीं सुनी उनसे मेरा वादा है कि दोनों आवाज़ें एक साथ बड़ी सुंदर लगती हैं...........................
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ये बीबीसी के एक विद्वान पत्रकार सुशील झा के ब्लाग अंश हैं.....जिसमें वे कल्पना करते हैं कि मंदिर के बगल में एक मस्जिद हो, तो भारत अजान और घंटी की आवाज सुनकर उनका दिल बाग-बाग खिल जाएगा. क्या सच में. कई लोगों ने उनके ब्लाग पर टिप्पणी की है। कुछ ने उन्हें जमकर कोसा है. कुछ सेकुलरवादियों ने उनकी तारीफ भी की है. जनाब को एक वक्त खुद से घृणा भी हुई थी. जब गुजरात दंगे हो रहे थे. कई बार तरस आता है कि इन कथित सेकुलर वादियों को ईश्वर सद्बुद्धि प्रदान करें.
मीडिया में, खासकर अंग्रेजी मीडिया में तो पत्रकार लोग खुद को सेकुलर साबित करने के लिए क्या-क्या कल्पना नहीं कर रहे. मंदिर के बगल में मस्जिद के लिए शायद चंदा भी इकट्ठा कर रहे हों। झा साब कहते हैं कि जब काशी, और मथुरा में मंदिर और मस्जिद साथ-साथ रह सकते हैं, तो राम जन्मभूमि अयोध्या में क्यों नहीं. खूब फरमाया झा साब ने। कोई उनसे कभी मूंछे साफकर दाढी बढ़ाने के लिए कहिए. या खतना करवाने के लिए कहिए. चलो इतना भी नहीं तो...उनके गांव में कोई मस्जिद की दीवार के सहारे मंदिर के दीवार बनाने के बारे में भी सोचिए. मगर वे ऐसा क्यों करेंगे. वे तो सेकुलरवादी है ना. उन्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है. कितना अजीब है, सेकुलर कहलवाना है, तो हिंदुओं को गाली देना शुरू कर दीजिए. उनकी भावनाओं का मनचाहे ढंग से मजाक करना शुरू कर दीजिए. भगवान राम को काल्पनिक बताना शुरू कर दीजिए. आपसे बड़ा सेकुलर आपके आसपास नजर नहीं आएगा.
दुनिया जानती हैं, कि भारत देश से बड़ा सहिष्णु देश दुनिया में कहीं नहीं है.कृपया...इन कथित सेकुलरवादियों को करारा जबाव दीजिए. अपनी प्रतिक्रियाओं से, लेखों से, पत्रों से, बोलकर या कहकर.

जय भारत