Tuesday, August 28, 2018

कश्मीर यात्रा/ चिनार ने कहा था

सोनमर्ग के रास्ते में बालटाल का अद्भुत दृश्य



चिनार जब आपको आमंत्रित करता है तो वह आपको ईरान नहीं बुलाएगा, क्योंकि उसका वंश तो ईरान से समाप्त हो चुका है। वह आपको कश्मीर की वादियों में आमंत्रित करेगा। सदियों पहले कश्मीर आए चिनार ने अब यहीं की आबो-हवा में अपना डेरा जमा लिया है। यूं मूल रूप से चिनार ईरान का वाशिंदा था। अपने अस्तित्व की हिफाजत के लिए जिस तरह अन्य सभ्यताओं से लोगों ने हिंदुस्तान में पनाह ली, फले, फूले और यहां का हिस्सा बने, उसी तरह सैकड़ो मीलों दूर ईरान से आकर चिनार कश्मीर की वादियों का सरताज, साक्षी और शोभा बन गया। उसकी कई पीढियां इन घाटियों की जड़ों में रच-बस गई हैं। वह भी कश्मीरीयत की पहचान बन गया है। प्राकृतिक रूप से देखें तो, वादियों की पहचान अब उसी से है। उसकी विशाल देह। कद काठी। उसके खूबसूरत झरते पत्ते। उसकी लंबी उम्र। उसके झरते पके पत्ते जब घाटी की धरती पर बिछ जाते हैं तो लगता है मानों घाटी अग्नि सिंदूर से नहा ली हो। हमने भी हवाओं में चिनार के संदेशों को महसूसा और एक ढलती शाम को वादी के आकाश का इस्तकबाल किया।

सैकड़ों सालों की उम्र लिए चिनार महसूसते हैं घाटी की सांसों को। उसकी कई पीढ़ियों ने कश्मीरियत को महसूस किया है। पंडितों, डोगरों, सिखों, सूफियों, अब्दुल्लाओं, मुफ्तियों, गिलानियों की सैकड़ों पीढ़ियों के बचपन से लेकर बुढ़ापे का वह गवाह रहा है। दहशत के साये में भी चिनार हवाओं के जरिए दूर-दूर बैठे सैलानियों को संदेश भेजता है इस दहशतगर्दी से खौफ खाने की जरूरत नहीं है, बंदूकों की गोलियां कभी इतनी ताकतवर नहीं होती कि वह इंसानों के जज्बे को छील भर सके। आइए, इन वादियों के साक्षी बनिये, जिनमें तुम्हारे आदि पुरुषों और महादेव ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को निखारा है। और इनमें एक शांति कायम की है। दहशतगर्दीवादी की नियत नहीं है। इसकी नियत शांति और अमन है। इसका शिव है। यहां का शैव है। यहां सूफी मत है। विश्वास कीजिए, यह शिव फिर स्थापित होगा। और धीरे धीरे हो रहा है।

गुलमर्ग के घास के मैदान में मास्टर तनव और इवा


तेरहवीं सदी में कश्मीर में शैव परंपरा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली गुरू लल्लेश्वरी या लाल देद की वाखें अभी भी वादियों में गूंजती हैं- हम ही थे, हम ही होंगे/हम ही ने चिरकाल से दौर किये/सूर्योदय और अस्त का कभी अन्त नहीं होगा/ शिव की उपासना कभी समाप्त नहीं होगी।

यह सच है कि कश्मीर में शिव की उपासना सदियों से हैं। घाटी शिव की तपस्या स्थली महाभारत के काल से भी पहले की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राजतरंगिणी, आईए-ए-अकबरी, नीलमत पुराण समेत कई ऐतिहासिक स्रोत इसकी पुष्टि करते हैं। मगर शिव की खोज में पंथनिरपेक्षता का तत्व डालने के मकसद से कुछ अलंबरदार इतिहासकारों ने रच दिया, अमरनाथ की गुफा की खोज कुछ भेड़ चराने वाले गुज्जर बकरवालों ने की। तब से यही इतिहास बार बार पढ़ाया जा रहा है। मानो, असल इतिहास बता दिया, तो कोई मजहबी तनाव हो जाएगा। यूं इतिहास कभी छिपा नहीं रह सकता। वक्त और पुर्वाग्रहों की खुरचन हटाते ही वह खुद ब खुद प्रकट हो जाता है।


छठी सदी में मीलों दूर समंदर किनारे केरल से आद्यगुरू शंकराचार्य भी यहां शिव की खोज में ही आए होंगे। शंकराचार्य ने यहां आकर धूनी रमाई थी। अपनी विशाल जलीय देह को समेटे डल के किनारे। डल के किनारे से सैकड़ों फीट ऊपर एक रमणीय पहाड़ी पर उनकी वह छोटी सी गुफा अभी भी मौजूद है, जहां वे शिवमय हुए थे। उसके पास ही मौजूद है भव्य और ऐतिहासिक शिवलिंग मंदिर। नीचे से ऊपर तक पूरा परिसर सुरक्षा बलों के आत्मबल से सुरक्षित है। पहाड़ी पर चढ़कर गाड़ी रुकने के बाद लगभग डेढ़-दो सौ सीढ़ियां चढ़कर मंदिर पहुंचते हैं। तनव इन सीढ़ियों के सरपट चढ़ गया, मगर महिला मोर्चा कमजोर रहा। मंदिर के घंट निनाद की ध्वनी तरंगे सैलानियों के साथ साथ डल के जिस्म को तरंगित करती हैं। यहां से पूरे श्रीनगर और वादी को महसूस कर सकते हैं, जिसे कुछ शायरों ने जन्नत का दर्जा दिया है। घंट निनाद को महसूस कर चिनार के पत्ते शिवोअहं बुदबुदाते हुए मुस्कराते हैं। उसे याद आता है अपना पैतृक घर ईरान यानी ऐतिहासिक पारस। पारस पर अरब, सिकंदर का आक्रमण। अरब आक्रमण के बाद तो जैसे ईरान की संस्कृति ही खत्म हो गई। उस संस्कृति के बचे खुचे अंश ईरान की इस्लामिक क्रांति ने समाप्त कर दिए अपने प्राचीन मंदिर, स्मारक और मूर्तियों को तोड़कर। चिनार को अफसोस होता है, कोई अपनी संस्कृति को खुद अपने ही हाथों कैसे खुरच खुरच कर खत्म कर सकता है। उसे हंसी आती है, देखिए, फिर भी अरब जगत उन्हें इस्लाम में शामिल करने के लिए तैयार नहीं है। और हर वक्त लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। इससे तो अच्छा था, अपनी बची खुची संस्कृति को फिर से जिंदा करते। उस पर गर्व करते। जैसे इजराइलियों ने किया। चिनार हिंदुस्तान का ऐहसानमंद है, जिन्होंने उस वक्त जान बचाकर भागकर आए पारसियों को अपने पश्चिमी समंदर किनारे आसरा दिया। पाला-पोसा-बड़ा किया। अब तो चिनार की पीढ़ियों का भी ईरान में कोई अस्तित्व नहीं रहा। अपनी धरती छूटने का दुख तो है, मगर वादियों की आवो-हवा उसे रास आ गई है।

डल झील में शिकारा के दौरान चप्पुओं पर हाथ आजमाने की कोशिश। 



वह आमंत्रित करता है हर साल श्रद्धालुओं को। महादेव की इस पवित्र तपस्थली में। हजारों फीट ऊंचे पर्वतों पर। महादेव ने भी इसी धरा को अपनी तपस्थली के लिए चुना। कोई तो उद्देश्य रहा होगा महादेव का। सैकड़ों हजारों वर्षों से देश के हर हिस्से से श्रद्धालु महादेव की तपस्थली का पवित्र दर्शन करने आते रहे हैं। और चिनार की शाखाएं, पत्ता-पत्ता उनका इस्तकबाल करता रहा है, सदियों से। चाहे वह बालटाल का रास्ता हो या फिर पहलगाम का। कितनी खुशकिस्मत है चिनार की पीढ़ियां। सैकड़ों सालों से श्रद्धालुओं को अपने साये में सुस्ताने का सौभाग्य उन्हें मिलता रहा है।

इस बार यह सौभाग्य हमें भी मिला। अपने परिवार और साडु भाई श्री यश मंगल के परिवार के साथ तेइस जून की शाम को हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंच गए। सड़क मार्ग से आते तो शायद और भी आनंद आता। मगर नौकरी में छुट्टियों का टोटा और छोटे बच्चों के साथ यह मुमकिन नहीं था। श्रीनगर पहुंचने के बाद मित्र श्री सुनील कौल के सानिध्य से आकाशवाणी परिसर में मौजूद संन्यासी से खड़े विशाल चिनार के पेड़ तले कुछ पल रहने का सुख मिला। इससे पहले चिनार को सिर्फ फिल्मों से पहचाना करते थे। वह भी उनके झरते लाल पत्तों में घुले कथित इश्क से, जो फिल्म वालों ने घोल रखा है, फिल्म स्क्रीन को खूबसूरत दिखाने के लिए। खैर, खयाल आता है, इस चिनार ने भी वे भयानक, डरावनी, अलगावग्रस्त और रूह कांपने वाली आवाजें सुनीं होंगी। अब्दुल्ला और वीपी सिंह सरकार के नाक तले। घाटी से कश्मीरीयत तब ही पलायन कर चुकी थी। तब इबादत के पवित्र स्थलों से निकली उन भयानक आवाजों ने कश्मीरीयत का गला घोंट डाला था। कश्मीरीयत ने उन्हीं दिनों वहां से रुखसत करना शुरू कर दिया। अब कुछेक टुकड़ों में कश्मीरीयत को घाटी में महसूस किया जा सकता है। मगर इसकी असल तस्वीर देशभर में बिखरी पड़ी है। कश्मीरीयत सियासत के नारों से ज्यादा कुछ नहीं बची है घाटी में। राष्ट्रवाद से प्रेरित सियासत भी कश्मीरीयत के घाव को भरने में नाकाबिल साबित हुई है, अगर स्थानीय अल्पसंख्यकों (कश्मीरी पंडित) की मानें तो। दिखावा ज्यादा हुआ, काम बहुत कम। काम के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।  

महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र वसु ने पेड़ों की जीवंतता मापने के लिए अगर चिनारों पर प्रयोग किए होते तो यकीनन, उन्हें अलग तरह के नतीजे प्राप्त होते। अगर उन्होंने चिनारों की धड़कनों पर अपना क्रेस्कोग्राफ* लगाया होता, तो उन्हें घाटी के इतिहास की ऊंची-नीची-पथरीली-रपटीली घाटियों के ग्राफ बने नजर आते। घाटियां दिखने में खूबसूरत हैं। इतनी कि किसी भी सैलानी का दिल इन पर आ जाए। अखरोट, बादाम, केसर, धान की खेती किसी भी सैलानी को लुभा सकती है। चिनाब, सिंधु, लीथर जैसी नदियां, जीरो प्वाइंट पर बर्फ में बर्फ के खेलों का आनंद, ऊंची-ऊंची पहाडियां, सड़कों के दोनों ओर घने हरे भरे पेड़, धान के खेत, झरने और नदियां घाटी को प्राकृतिक सौंदर्य से संवारती हैं। मगर, इन वादियों में उतना ही दर्द भी पसरा है। चिनार की टहनियों के पास जुबान होती तो, वे बताती।

जून महीने के आखिर में घाटी में पर्यटन उतार पर होता है। इसलिए होटल, रेस्तरां, शिकारा की बहुत मारा मारी नहीं होती। आप इत्मीनान से श्रीनगर में इनका लुत्फ ले सकते हैं। 23 जून की शाम को लाल चौक पार करते हुए अपने पूर्व नियोजित रहवास में पहुंचे। डल हमें अपने नजदीक पाकर मचल रही थी, या हम उसे अपने करीब पाकर खुश थे। ये या तो वह जानती है या हम। हां, लाल चौक एकदम सफेद था उस दिन। किसी जिलानी ने कोई कॉल नहीं किया था उस दिन। उससे दो दिन पहले यहां जरूर बंद था। बंद की खबर पढ़कर साडु भाई ने चिंता जताई कि बंद में कश्मीर कैसे चलेंगे। कौल साब को फोन किया। उन्होंने आश्वास्त किया। बंद की चिंता मत करो। चले आओ। ये बंद यहां का हिस्सा है। और सचमुच बंद के तीसरे दिन, तेइस जून को लोगों का जीवन बड़ी शांति और अमन से गुजर रहा था। देर रात तक दुकानें खुली थी। सड़क पर ट्रैफिक किसी आम महानगर की तरह सरक सरक कर रेंग रहा था। झेलम श्रीनगर के बीचों बीच से गुजरती है। उसके ऊपर बने पुल पर सैंकड़ों वाहन अक्सर निकलने की जद्दोजहद में एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। खैर, इस पुल से कई बार गुजरने का मौका मिला और हर बार जाम में अटकना पड़ा। 

पहले दिन मुगलई बगीचों निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मेशाही बगीचे से रूबरू हुए। तीनों में एक बात जो कॉमन थी वह वे झरने जो घाटियों से निकलते हुए, बाग को गुलज़ार करते हुए डल में अपना अस्तित्व खो देते हैं।  मुगलई अंदाज में बने ये बगीचे मुगलकाल में दिल्ली की तपती मुगालफत और सुलगते आक्रोश से छुटकारा पाने के लिए मुगल बादशाहों की ऐशगाह हुआ करते थे। हालांकि दूसरी किस्म के कई पेड़, पौधे और घास यहां लगी है, मगर इन बगीचों की खूबसूरती चिनार से है, जैसे घर में बुजुर्ग के होने से। अगर चिनार इन बगीचों से हटा दिए जाएं, तो बगीचे विधवा हो जाएंगे। मुग़लो ने भले अपनी अय्याशियों को आरामदेह बनाने के लिए इन बगीचों का निर्माण करवाया हो, मगर फिलहाल बच्चों के लिए ये किसी खुशनुमा पार्क से कम नहीं है। बच्चे इनमें बहने वाले झरनों में अपना बचपन जीते हैं। खूब टोका टोकी के बावजूद मास्टर तनव ने इन झरनों का जमकर लुत्फ उठाया। इन बागों का असली मजा उसी ने लिया, बाकि हम तो पेड़ों की छावों में मोबाइलों में तस्वीरें ही उतारते रहे। तनव को इन तस्वीरों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे बस, उन झरनों में भीगना था। वह खूब भीगा, फिसला और नहाया। वह चाहता था कि उसके कपड़े गीले हो जाएं और फिर उसे नहाने की इजाजत मिल जाए। मगर वह बिना इजाजत भी नहाया। अब, बचपने को कोई अनुशासन कब बांध सका है।

खैर, बात डल झील की। जितना रोजगार सरकारों ने यहां के लोगों को नहीं दिया, उससे कई गुना रोजगार श्रीनगर में शांत भाव से पसरी खूबसूरत डल झील ने लोगों को दिया है।  शांत झील कितना रोजगार पैदा करती है, और दहाड़ते समंदर दो  वक्त की रोटी भी नहीं दे सकते। कितने वर्षों से ये खोखले समंदर वादियों में महज खोखले चिंघाड़ रहे हैं। जिनमें अक्सर सरहद पार के खारे समंदर भी मिल जाते हैं। कभी कभी इनकी आवाज़े दिल्ली दरबार और हैदराबाद हाउस तक सुनाई देती थी। और उनके इस्तक़बाल में सियासत बिछ जाती थी। अब हालात बदल रहे हैं। महादेव करें ये और तेजी से बदले।

पूरा श्रीनगर इसी डल के किनारे किनारे बसा हुआ है। शाम के वक्त डल किनारे टहलना अलग तरह का रोमांच पैदा करता है। कभी बालीवुड के सितारों से जड़ी डल अब थोड़ी उखड़ी उखड़ी दिखती है। डल की स्वच्छता आकर्षित करती है। डल में बीच बीच में मौजूद मिट्टी के टापुओं पर स्थानीय नागरिक सब्जियां पैदा करते हैं। ये सब्जियां बहुत स्वादिष्ट होती हैं।

हमारे शिकारा के केवट मंजूर अहमद के मुताबिक डल उनकी ज़िंदगी है। पांच साल का बच्चा भी सबसे पहले दोस्ती चप्पुओं से करता है। क्योंकि उनकी ज़िंदगी के ताउम्र दोस्त ये चप्पू ही होते हैं। मंजूर अहमद बताते हैं कि सियासत की सारी ताक़त तो कश्मीर में अलगाव के मुद्दे को ज़िंदा रखने में लग जाती है। यहां के नागरिकों को रोजगार और घाटी के विकास के बारे में चिंतन करने को किसको फुर्सत है। आम नागरिकों से उनका ज्यादा वास्ता नहीं है। वे कहते हैं, बेटे ने ग्रेजुएशन किया है। तीन लाख रुपये देने के वादे पर भी नौकरी नहीं मिली। अब डल में ही शिकारा चला कर अपनी ज़िंदगी गुजार रहा है। वह कुछ गुनगुनाता है। बीच बीच में अपने साथियों से कश्मीरी में बातचीत करता है।

टैक्सी के ड्राइवर बिलाल ने सियासत को अपने तरीके से समझाया। उसने कहा, घाटी में कोई पार्टी नहीं चाहती अमन हो। अगर एक पार्टी हार गई तो वह अलगाववाद को अपने तरीके से जिंदा रखती है। अलगाववादियों को सहलाती है। पत्थरों को इकट्ठा करके रखती है। यहीं चीजें उन्हें घाटी में जिंदा रखती है।  सियासत का यही दुर्भाग्य है। जिन बातों से उन्हें जिंदा नहीं रहना चाहिए, वे ही उनके जीवन स्रोत हैं। 

फिर से शिकारा के केवट की बात। डल में शहर की एक पूरी अर्थव्यवस्था चलती है। जैसे ही शिकारा झील में सौ डेढ़ सौ मीटर आगे बढ़ता है, मक्का वाला अपनी नाव लेकर आपके शिकारे से सटा देता है। आगे एक फल वाला आता है। एक प्लेट में पेश है-तरबूज, आम, लीची, केला, सेव के कटे टुकड़े। फिर आपकी डल यादों को अमर करने के लिए कुछ कश्मीरी पोशाकों के साथ एक नाव आती है। वह आपके शिकारा में ही आपको उन पोशाकों को पहनाकार आपकी तस्वीर ले लेगा। थोड़ा आगे बढियेगा तो नगीनशीं आपके मन मुताबिक अंगूठी तैयार कर देगा। 
अगर श्रीनगर बन्द है और आपको शॉपिंग करनी है तो डल आपके लिए बेहतरीन मॉल है। झील के भीतर टापुओं पर हर तरह की दुकान बंद के दौरान भी खुली मिलेगी। यहां आप काश्मीर के शॉल और दूसरी चीजें खरीद सकते हैं। झील के भीतर कई टापू हैं जहां जीवन भरपूर ज़िंदगी के साथ चलता है। यह झील अपने भीतर उगे कई टापुओं को जिंदा रखती हैं। हम एक ही शिकारे में घंटों घूमते रहे। तनव ने यहां भी अपने बचपने का आनंद लिया। पापा, मुझे चंपू (चप्पू) चलाना है। अरे साब, बच्चा है, आने दीजिए, मंजूर अहमद ने कहा। तनव एकदम खुश। वह शिकारे की सीटों के पीछे पहुंच गया। और वहां रखा अतिरिक्त चप्पू को चलाने लगा। उसे भ्रम हुआ कि उसके चप्पू चलाने से हमारी नाव आगे बढ़ रही है। वैसे, बच्चों में इस तरह के भ्रम पैदा करते रहने चाहिए। इससे उनका हौसला बढ़ता रहता है। 







यात्रा के दौरान अगर आवास व्यवस्था यानी होटल अच्छा मिल जाए, तो यात्रा काफी सुखद हो जाती है। इस मामले में हम खुशकिस्मत थे। हमें डल से महज सौ मीटर दूर एक बेहतरीन होटल मिल गया। इसकी खोज हमने वहीं श्रीनगर में इंटरनेट की मदद से की। मगर भोजन की समस्या सबसे बड़ी थी। क्योंकि लगातार पांच दिन बाहर खाना, बीमारियों को आमंत्रित करना है। इस मामले में भी किस्मत ने हमारा साथ दिया। उस पूरे होटल में हम ही दो परिवार थे। होटल कार्मिकों ने हमारे लिए हर रोज सुबह नाश्ता और शाम का खाना घर जैसा बनाकर दिया। प्रगति (साली साहिबा) ने उन्हें उत्तपम भी बनाना सिखा दिया। और हां, श्रीनगर की मिर्चियां लाजबाव थीं। देखने में मामूली मगर स्वभाव में तेज।

जून के आखिरी दिनों में अमरनाथ की यात्रा शुरू होने वाली थी। लिहाजा हर जगह फौज अनजाने खतरों के बीच श्रद्धालुओं की हिफाज़त के लिए मुस्तैद थी।  सोनमर्ग के रास्ते में चढ़ते ही एक बोर्ड आपका स्वागत करता है-फ़ौज आपकी सेवा में- सचमुच कितनी तसल्ली मिलती है इसे देखकर, पढ़कर और महसूस कर। जवान स्थितप्रज्ञ की तरह अपने हथियारों के साथ मुस्तैद रहते हैं। अगर चलती गाड़ी में उनको सलाम किया तो मुस्कुराते हुए सिर हिला देते हैं। हर डेढ़ सौ दो सौ मीटर की दूरी पर एक या दो जवान तैनात थे। अमरनाथ यात्रा का एक रास्ता बालटाल के रास्ते सोनमर्ग होते हुए जाता है। ये कम दूरी का है, मगर अनंतनाग से थोड़ा मुश्किल है। सोनमर्ग के रास्ते मे सिंधु नदी पूरे उफान से बहती हुई चलती है। इसके किनारे कई रेस्टोरेंट हैं। सोनमर्ग के रास्ते मे ज्यादातर रेस्तरां पंजाब के नाम पर है। खास बात यह कि सामिष खाने वाले प्रदेश में शुद्ध शाकाहारी खाने वालों के लिए सोनमर्ग से बेहतर कुछ नहीं है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय , पंजाबी , पहाड़ी हर तरह का शाकाहारी भोजन इस रास्ते मे है।
निशात बाग में तनव, ईवा और गीत।
शालिमार बाग में तनव और गीत


सोनमर्ग से तीस किलोमीटर आगे है जीरो पॉइंट। यानी लाइन ऑफ कंट्रोल से थोड़ा पहले। यहां पहाड़ के जिस्म से चिपकी बर्फ पर सैलानी बर्फ के खेलों का आनंद लेते दिख जाते हैं। इसी बर्फ के निचली तहों से बहता पानी आगे सिंधु नदी में घुलकर पाकिस्तान के रास्ते समंदर में विलीन हो जाता है। पानी भी कितना सफर करता है। जीरो पॉइंट से पहले बालटाल में अमरनाथ यात्रियों ने अपने डेरे जमा लिए थे। उनके रंग बिरंगे टैंटों को पहाड़ों से देखते हैं तो लगता है घाटी किसी दुल्हन सी सजी बैठी है।

बर्फ देखने का रोमांच इस बार प्रगति को ज्यादा था। और उससे ज्यादा था मास्टर तनव को। पहले सिर्फ सोनमर्ग तक जाने की योजना थी। सोनमर्ग से जीरो प्वाइंट तक जाने के लिए सोनमर्ग से अलग टैक्सी करनी होती है। इस टैक्सी के लिए जमकर मोलभाव होता है। यश साब की चतुराई से हमारा मोलभाव ग्यारह हजार से उतरकर सात हजार तक आ गया। हालांकि बाद में अफसोस हुआ, और खींचातानी करते तो यह पांच हजार से नीचे भी जा सकता था। खैर, जीरो पाइंट पहुंचकर बर्फ का रोमांच एक बार फिर आंखों, मन और मस्तिष्क में भर गया। टैक्सी ड्राइवर हमें बर्फ से बचाव के लिए कपड़े का आग्रह करता रहा, मगर हम अपने ही कपड़ों में बर्फ पर पहुंच गए। वहां स्लैज गाड़ी देखकर मास्टर तनव बिगड़ गया। मास्टर तनव को जब स्लैज गाड़ी पर नहीं बिठाया गया, तो उसने उस्तादी दिखाते हुए वहां पड़ी एक स्लैज गाड़ी को खींचकर ऊपर तक ले गया। शायद उस पर बैठकर अकेला ही फिसलना चाहता था। मगर इस दौरान एक स्लैज गाड़ी वाले से मोलभाव किया। तनव के साथ हमने भी उसका लुत्फ उठाया। ऐसी जगह पर, अगर कोई खतरा नहीं हो, तो बच्चों के भीतर के रोमांच को बाहर जरूर आने देना चाहिए। तनव स्लैज का दीवाना हो गया। स्लैज पर फिसलने के बाद वह फिर से किसी की खाली पड़ी स्लैज को ऊपर खींचने लगा। मजे की बात, कोई भी स्लैज मालिक उसे टोक नहीं रहा था। पूरे रास्ते में तनव और गीत ने रास्ते का खूब आनंद लिया।

गुलमर्ग लगभग सोनमर्ग जैसा है। यह सीमाई इलाका है। गुलमर्ग के मैदान रोमांचित करते हैं। यहां चौड़े, विशाल हरे मैदान मन को ठंड़क देते हैं। बस, घोड़ेवाले आपके पीछे न पड़े। मुश्किल ये है कि घोड़ेवाले आपको यहां चैन से घूमने नहीं देंगे। वे आपको मजबूर कर देंगे कि आप उनके घोड़ों पर बैठकर ही गुलमर्ग का आनंद ले सकते हैं। मगर इस बार हम अड़े रहे। घोड़े की तरह। मगर यहां भी मास्टर तनव की घोड़े पर बैठने की जिद मचल गई। आखिर दो सौ मीटर की दूरी तक घोड़े की सवारी कर उसने अपनी जिद पूरी की।

गुलमर्ग के हरेभरे मैदान में बीचों बीच एक शिवमंदिर है। देश के अन्य हिस्सों से आने वाले सैलानी इस मंदिर के दर्शन के लिए जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में उतनी तादाद में खाने के रेस्टोरेंट नहीं है जितने सोनमर्ग के रास्ते में है। इस रास्ते में सेव के कई बगीचे हैं। हालांकि उस वक्त सेवें जवान नहीं हुई थी, उन पर हरियापा छाया हुआ था। बीच में कालीन और शाल के कई कारखाने दिखे। गुलमर्ग के रास्ते में कश्मीर घाटी को रेल मार्ग से जोड़ने वाली पटरियां नजर आती हैं। संभव है जल्द ही घाटी तक का सफर रेलमार्ग से हो सकेगा।    

पहलगाम यानी बैल गांव अनंतनाग जिले का हिस्सा है। अमरनाथ यात्रा का यह मुख्य रास्ता है। यह रास्ता आगरा-बीकानेर राजमार्ग जैसा आरामदेह है। एकदम सपाट और चौड़ी सड़क। आधारभूत ढांचे के स्तर पर हुए काम का यह बेहतरीन प्रतीक है। अनंतनाग श्रीनगर से लगभग 60-65 किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते से जम्मू का रास्ता निकलता है। वैसे अमरनाथ यात्रा के लिहाज से देखें तो यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का रास्ता है, जहां से पांच हजार वर्ष पहले पांडवों ने महाप्रयाण किया था।

 इसी से शोपियां का रास्ता निकलता है। अलगाव की चिंगारियां इस इलाके में ज्यादा सुलगाई जाती हैं, लिहाज़ा सेना के जवान और स्थानीय पुलिस के जवान हर सौ मीटर पर मौजूद है। इन जवानों पर हर वक़्त किसी अनजाने खतरे का साया रहता है। मगर मौत को ये अपनी मुट्ठी में रखते है। सैलानियों को सेना के जवान बायपास रास्तों से नहीं जाने देते। सुरक्षा कारणों से। हमारे साथ हमारे मित्र और स्थानीय रहवासी सुनील कौल साब थे। उन्होंने कश्मीरी में उनसे बात की, मगर जब उन्होंने हमारे चेहरे देखे तो बाईपास रास्ते से जाने से एकदम मना कर दिया। इस रास्ते के दोनों और अखरोट के पेड़ और लीथर नाला साथ साथ चलते हैं। 

पहलगाम की यात्रा के दौरान बीच में पड़ता है पंपोर इलाका। यह दक्षिण कश्मीर के आतंक सक्रिय जिला पुलवामा का हिस्सा है। पुलवामा जिला केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर में सबसे ज्यादा केसर पुलवामा के पंपोर क्षेत्र में होती है। और दुर्भाग्य से पंपोर में अलगाव के बीज भी खूब पनपते हैं। कैसा विरोधाभास है। पूरी घाटी में आम लोगों में सियासी पार्टियां केसरिया के प्रति दुर्भावना भरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। घाटी में सियासी दलों और अलगाववादी संगठनों को सबसे ज्यादा खौफ या नफरत केसरिया रंग से है।  इतना फोकस अगर केसर पर किया होता तो इस इलाके की आर्थिक हालात और भी ज्यादा मजबूत होती। खैर। 

कश्मीर में आपने कहवा नहीं पिया, तो समझिए आपसे कुछ न कुछ छूट गया। स्थानीय कहवा तरोताजा करने के लिए काफी है। पहलगाम से लौटते वक्त सूखे मेवों की एक दुकान पर कुछ सूखे मेवे खरीदने के बाद दुकानवाले अब्दुल डार ने कहवा आफर किया। स्थानीय चाय और सूखे मेवे मिश्रित कहवा एक अलग तरह का बेहतर स्वाद जुबाँ पर चिपका देता है। यूं तो कश्मीर में वाजवान यानी बकरे के गोश्त से बना खास व्यंजन यहां की खासियत है, मगर निरामिष का संस्कार उस ओर जाने से रोकता है। और भी खास बात, रेगिस्तान का फल तरबूज यहां बहुतायत में पाया जाता है। हर फल वाले की दुकान पर तरबूज मिल जाएगा।

पहलगाम के रास्ते में ऐतिहासिक और पौराणिक स्थान मट्टन है। यहां भगवान सूर्य का मंदिर है। उसके आगे बहुत साफ सुथरे तीन कुंड हैं। इनमें श्रद्धालु मछलियों को दाना डालते हैं। यहां अभी कुछ मंदिरों का निर्माण कार्य चल रहा है। मट्टन का जिक्र कई पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है।

मट्टन से आगे निकलने पर रास्ते में उजड्ड से खड़े निर्वासित कश्मीरी पंडितों के घर, जो अब भी खौफ, नफरत, अलगाव के इतिहास को समेटे है,  मन को व्यथित कर देते हैं। सड़क किनारे अभी भी बेखौफ खड़े विशाल घरों के खोखले पिंजर, टूटी खिड़कियां और दरवाजे, आंगनों में उग आए जंगली पौधे घरों की तात्कालिक बिवशता, असहाय, बेसहारापन जैसी हालत बयां करते हैं। जिस वक्त राष्ट्रवादी पार्टी के समर्थन से वीपी सिंह गठबंधन सरकार चला रहे थे, उस वक्त कश्मीरी पंडितों को भद्दी और गंदी चेतावनियों के साथ अपने आशियानों से बेदखल किया जा रहा था। कितने मट्टू, कौल, सप्रुओं की यादें इन टूटी खिड़कियों और दरवाजों से चिपकी हैं। दुर्भाग्य से, जिस पीढ़ी की इन घरों में पैदाइश हुई, उन्हें इनमें मरना तक नसीब नहीं हुआ। नई पीढ़ी जो दिल्ली, जम्मू और दूसरी जगहों पर जन्मी, पली और बढ़ी हुई है, वक्त की धार के साथ-साथ उनका भावनात्मक लगाव इन टूटे घरों से कितना रहा है, कहना मुश्किल है। मगर, दिल्ली और श्रीनगर की सियासत के चेहरों पर ये बिखरे घर कई बदनुना दाग छोड़ देते हैं।



हमारे साथ, हमारे मार्गदर्शक के रूप में चल रहे श्री सुनील कौल के परिवार को भी 90 के दशक में घाटी में अपने विशाल घर को छोड़कर  जम्मू का रुख करना पड़ा। तब उनकी उम्र 16-17 की थी। उन्हें वो मंजर अब भी हूबहू याद है। मगर मैंने उन्हें कुरेदा नहीं। उन जख्मों को कुरेदने से बेहतर है उनकी साफ सफाई कर उनमे मलहम भरा जाए। अपने ही घर के आंगन में टैंट लगाकर रहना किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। विकसित लोकतंत्र में यह अस्वीकार्य है। कुछ आवाजें उठ रही हैं। मगर एक बात तय है बिना शक्ति भक्ति संभव नहीं है। पंडितों को सिर्फ सियासत के बल पर ही नहीं, बल्कि अपने भुजबल और आत्मबल से अपने खोये अतीत को हासिल करना होगा। बिल्कुल इजराइल के यहूदियों की तरह। बिना ज़मीन के अस्तित्व के भी यहुदियो ने दो हज़ार साल तक अपने भीतर बिना जमीन और आसमान वाले राष्ट्र को ज़िंदा रखा। जब भी मिलते तो कहते अगली बार यरुसलम मिलेंगे।  क्या पंडित भी श्रीनगर में मिलने, आशियाना संवारने, और शक्ति का नया केंद्र बनाने के वादे के साथ  मिलने की हिम्मत करेंगे।  संभव है आने वाले दिनों में उनके उजड़े घरों में फिर से गृह प्रवेश की शहनाई बजे। चार दिन बाद एक अलसाई सुबह में भीगी वादियों को छोड़ हम वापस लौट आए। लौटते-लौटते भीगते चिनारों ने हमसे वापस आने का वादा लिया। उसके मौन शब्दों ने कहा, देखिएगा, जल्द ही घाटी में गृहप्रवेश की शहनाइयां गूंजेगी। तुम फिर लौटकर आना सैलानी।
उम्मीद है कश्मीर की अगली यात्रा किसी कश्मीरी पंडित मित्र के  गृह प्रवेश के निमंत्रण पर होगी।

Wednesday, October 4, 2017

रेल ज्ञान-1


महवा के जंगल/ आरपीएससी का धणी-धोरी

उल्टी गिनती शुरू कर दो, सर। इस सरकार को तो अब भगवान भी नहीं बचा सकता। अब आप देखिए, हमारे जिले में स्कूल लेक्चरर की दो सौ ढाई सौ से ज्यादा सीटे खाली हैं, लेकिन खुन्नस निकालने के लिए मुझे अपने घर से तीन सौ किलोमीटर दूर झाड़ौल के जंगलों में छोड़ दिया है, जहां हर पल जान को खतरा है। मेरी स्कूल में दसवीं बारहवीं क्लास के बच्चों पर मर्डर के केस हैं। मास्टरों को वे ओए...कहकर बुलाते हैं। क्या इज्जत है सर हमारी स्कूल में। बारहवीं तक की स्कूल में हम छह टीचर हैं। आप सोचिए नंगा नहाएगा क्या निचोड़ेगा क्या।  परिवार को यहां ला नहीं सकता। न ढंग की रहने की जगह है न पढ़ने की। अब सोच रहा हूं पास में गुजरात है, वहां से डेली अप डाउन करूंगा। जब तक चल रही चलाऊंगा। जयपुर अजमेर रेल सफर में अनारक्षित डिब्बे में उपरी बर्थ पर मेरे साथ बैठे और अभी तीन महीने पहले ही सरकार में स्कूल लेक्चरर भर्ती हुए एक युवा का रेल ज्ञान सुन रहा था। भाई साहब सब कुछ क्लियर होने के बाद भी जब सरकार नौकरी नहीं दे तो युवा कहां जाए। हमने आंदोलन किए, धरने प्रदर्शन किए, तब जाकर पोस्टिंग दी। पूरी खुन्नस निकाल कर। यहां गुजरात बोर्डर पर महवा के जंगलों के बीच। बारहवीं क्लास में कुल जमा तेरह बच्चे और उन्हें मुख्यमंत्री का नाम तक ढंग से लिखना नहीं आता। उन्हें पढ़ाऊं क्या और लिखाऊं क्या। सोच रहा हूं जीओ (राज्यादेश) करवा करवा लूं। लेकिन उसका भी कोई सूत्र नहीं बैठ रहा।
फिर ट्रांसफर व्यवस्था पर ज्ञान देते हुए कहने लगा- एक लाख तक तो खर्च कर सकता हूं। इससे ज्यादा मेरी औकात नहीं है। तब ही सामने ऊपर की बर्थ पर बैठा एक सरकारी चिकित्सालय में कंपाउंडर बोल उठा- सर, इतना तो हमारे जैसे कंपाउंडर के लिए ले लेते हैं। आप तो लेक्चरार हो, गजेटेड हो। गजेटेड शब्द आते ही लेक्चरार भाई साब का दर्द उभर गया। कोई जानता तक नहीं साब, कि हम गजेटेड हैं। हमारी कोई इज्जत नहीं है। सरकार प्रोबेशन पीरियड में इतना भर देती है कि बस, दाल रोटी निकल जाती है। अब जीओ (राज्यादेश) के लिए एक लाख का जुगाड़ कहां से करें। सामने वाले ने ज्ञान दिया, सुना है आरएसएस वालों की बहुत चलती है। उनका कोई आदमी मंत्रीजी को कह दे, तो आपका काम बन सकता है। आरएसएस के किसी स्टेट लेवल के आदमी को पकड़ लो। लेक्चरार बोला, मैं तो अपने पूरे रिश्तेदारों तक को नहीं जानता। अब आरएसएस के आदमी को कहां से पकड़ूं। कोई बीच का आदमी पकड़ना पड़ेगा। अपने पिछले प्रयासों की चर्चा करने लगा, एक मंत्री के पीए से मेरी बात हुई है। उसने कहा कि उसके मंत्री के पास यह डिपार्टमेंट नहीं है, नहीं तो वह एक लाख रूपए में यह काम आसानी से करवा देता। खुद के भीतर उम्मीद जगाते हुए बोला- मेरे एक दोस्त ने अभी जीओ (राज्यादेश) करवाकर अपने घर के पास ट्रांसफर करवाया है। उसने उम्मीद जताई है और कहा है एक लाख तैयार रखना। मेरा प्रिंसिपल भी उस स्कूल में नहीं रूकना चाहता। वो भी कह रहा था, जितने भी लग जाए उसे भी वहां से निकलना है। कुछ भी नहीं होने की स्थिति की कल्पना करते हुए युवा लेक्चरार कहने लगा, अगली बार या तो कांग्रेस सरकार आ जाए नहीं तो कुछ भी नहीं हुआ और अगली बार भी यही सरकार रही तो आरएसएस ज्वाइन कर लूंगा।
फिर चर्चा आरपीएससी की। युवा लेक्चरार फिर शुरू हो गया, सर, सरकार जानबूझकर गलत पेपर बनाती है। एक दो सवाल जानबूझकर गलत डालती है, जिससे कोर्ट में केस हो। युवा बेचारे लड़ते झगड़ते रहे। सोचो कोई आईएएस जैसा आदमी ऐसे गलत सवाल डाल सकता है क्या। आईएएस से उसका तात्पर्य शायद आरपीएससी के सचिव या अध्यक्ष से रहा होगा। कहने लगा- कोर्ट-कचहरी के चक्कर में आठ-दस महीने बेरोजगारों के ऐसे ही चले जाते हैं। और वकीलों की फीस अलग। इस चक्कर में सरकार आठ-दस महीने की तनख्वाह बचा लेती है। गंभीरता से कहने लगा सर, ये पूरी रणनीति से होता है। फिर चुनाव आ जाएंगे। आचार संहिता के बाद तो बेरोजगार मुंह ताकते रहो। नई सरकार आएगी। फिर समीक्षा करेगी। फिर भर्तियां निकालेगी। तब तक बेचारे युवा आधे बूढ़े हो जाते हैं। और आरपीएससी, साब, आरपीएससी का कोई धणी धोरी नहीं है। और कोई बेरोजगार इसके चक्कर में आ जाए तो उसके ब्याह के लाले पड़ जाए। लेकिन डिग्रियां तो इकट्ठी कर ली। कंपाउंडर साब बोले- डिग्रियां तो बेकार है साब। अब डिग्रियों का जमाना गया।

Wednesday, November 2, 2016

समंदर से भेंट


इस बार समंदर से भेंट करने की तीव्र इच्छा हमें सुदूर पश्चिमी तट दीव तक खींच ले गई।


यह शायद अमिताभ बच्चन की अपील का नतीजा था कि कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में....या फिर कहीं न कहीं जाने की असमंजस में से निकली कोई योजना। खैर, हमने इस बार समंदर देखने की अपनी इच्छा को मरने नहीं दिया। सितंबर का पहला हफ्ता। कुछ सरकारी छुट्टियां और कुछ निजी दोनों को मिलाकर हम निकल पड़े जयपुर से सुदूर दक्षिण पश्चिम की ओर से गुजरात के अहमदाबाद से होते हुए केंद्र शासित दमन दीव के दीव द्वीप में। गुजरात की जमीन की नाल से जुड़ा है यह दीव। लेकिन जैसे गुजरात की जमीन को छोड़कर दीव में प्रवेश करते हैं यह एहसास हो जाता है कि आप अपनी मन मुताबिक जगह पर पहुंच गए हैं। साफ-सुथरी चौड़ी सड़क। सड़क के किनारे समंदर हमारी ओर झांकता हुआ। और हम उसकी ओर निहारते हुए। रेत के आदमी को समंदर इसी तरह प्यार करता है। दीव अरब सागर के समंदर के खारे पानी से तीनों ओर से घिरा हुआ है और इसका जुड़वा हिस्सा दमन यहां से कई मीलों दूर कोंकण तट पर मौजूद है। वहां जाने के लिए अलग से योजना बनानी होगी। अहमदाबाद से अपनी निजी कार से लगभग चार सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर हम दीव में अपने जालंधर बीच पर बुक करवाए राजकीय अतिथि गृह में पहुंच गए। अहमदाबाद से यहां तक बिना सुस्ताए आठ घंटे में पहुंच सकते हैं। सड़कें बेहतरीन हैं गुजरात में। कुछ अंदरूनी मौसमी सड़कों को छोड़ दें तो।

नागोवा समंदर तट पर 
पीक पाइंट, दीव

जालंधर बीच। बीच के पास राजकीय अतिथि गृह। अगर बीच के पास रात बिताने का अवसर मिले तो कभी नहीं चूंके। खासकर बच्चे साथ हों तो उनके लिए यह अद्भुत अनुभव होता है। चार जोड़ी हम लोग और ढाई जोड़ी हमारे बच्चे। अतिथि गृहों में अपना सामान ठिकाने लगाकर समंदर देवता से रूबरू होने उसके भीतर घुस गए। गरजता, चिंघाड़ता और उठा-पठक करता हुआ मानों वह बरसों से हमारी राह देख रहा हो, या हम उसकी। कौन निर्णय करेहमें घुटनों तक छूने को कोशिश करता हुआ। पीछे हटकर फिर तेजी से लहरों पर दौड़ता हुआ हमें अपनी आगोश में लेने को तत्पर था। हमें भ्रम था यह हमसे हम बदन होने को लालायित है, मगर ऊपर शुक्ल पक्ष का चंद्रमा न मालूम उसे क्या इशारा कर रहा था। मगर, हम अपने भ्रम में ही उस रात भरपूर उसका दीदार करते रहे। सभी अपने हमराहियों के साथ। जालंधर बीच की पक्की दीवारों पर बैठकर। यात्रा की थकान ने हमें बिस्तरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। लेकिन उस रात न जाने समंदर क्या बातें करता रहा चांद से। उसके बदन पर टिके व्यापारिक जहाज और नावें अपनी टिमटिमाती मद्धम बत्तियों के साथ झिलमिलाते रहे। सुबह किसी मंजिल की और दौड़ पड़ने के लिए।

दीव किले पर 

इन समंदरों से रूबरू होना है तो आफ सीजन में इनसे मिलिए। आप तफ्सील से इन्हें गुनगुनाते देख सकते हैं। इसलिए हमने भी सितंबर के शुरुआती हफ्ते को चुना। पूरा गुजरात इन दिनों आने वाले दुर्गापूजा के लिए गरबा की तैयारियों में मशरूम था। दीव भी इससे अछूता नहीं था। जगह जगह गरबा की तैयारियां यहां भी हो रही थी। और गणेश विसर्जन में लोग जुटे हुए थे। गणेश चतुर्थी की सवारी में लोगों बॉलीवुड के गानों पर थिरक रहे थे। रास्ते साफ सुथरे, व्यवस्थित यातायात व्यवस्था और करीने से सजी धजी दुकाने। गुजरात की तरह यहां शराब बंदी नहीं है। लिहाजा मदिरालय के शौकीन गुजराती अपनी शामें अक्सर यहां गुजारते नजर आ जाते हैं।

दीव किले पर 
दीव किले पर

यात्रा के दूसरे दिन की शुरुआत दीव के दूसरे बीच नागोवा के समंदर तट से हुई। रेतीला समंदर तट। सामने खजूर के लंबे पेड़। नारियल पानी के दर्जनों ठेले। तीखी धूप। जलीय खेलों से भरपूर सामग्री। लेकिन सैलानी अपने ही खेल में व्यस्त। कई युवा प्रेमी जोड़े समंदर को साक्षी मानकर अपने प्यार का अफसाना गाते नजर आ रहे थे। बाहों में बाहें डाले समंदर की सैर कर रहे थे। समंदर अपनी उफनती लहरों से सैलानियों को अपने किनारे पर पटक पर उन्हें उनकी औकात को नापने का इशारा करता। लेकिन सैलानी भी कहां ये सब मानने को तैयार होते हैं। हम भी नहीं थे। अपनी औकात से ज्यादा उसे मथते हुए उसमें उतरते जाते। नमकीला पानी जब नथुनों से होकर गले में उतर जाता है तो समंदर के होने का एहसास जीभ पर आ जाता है। जमकर तस्वीरें, सेल्फियां और ग्रुप फोटो उतारकर यहां से इस छोटे से शहर से रूबरू होने के लिए निकल पड़े।
कई सदियां यहां पुर्तगाली शासकों के पदचापों में गुजरी हैं। ऐसे में पुर्तगाली सभ्यता के अंश इस शहर में बिखरे पड़े हैं। खासकर दीव का किला और उसकी बुनावट। पुर्तगालियों ने अपनी भरपूर ऊर्जा और दिमाग इस किले की सुरक्षा में लगाया होगा। किले के अभेद्य बनाने के लिए यह समंदर के किनारे बनाया गया है जिसकी अस्सी फीसदी चार दीवारी को एक गहरी खाई के माध्यम से सुरक्षित किया गया है। किले की दीवारों पर अभी भी उस वक्त के लिखे लेख साफ नजर आते हैं। सामने एक बड़ा सा क्रॉस, ईसाई धर्म का प्रतीक किले के ऊपर दिख जाता है। खंडहर हो रहा यह किला सैलानियों को एक बेहतरीन सुकून देता है। दरअसल यहां से समंदर को उसके पूरे यौवन रूप में देखा जा सकता है। भरा-पूरा। उफनता हुआ। साफ-नीला। चट्टानों से मुठभेड़ करता हुआ। किले की दीवारों पर चिंघाड़ता हुआ।  जैसे कोई पुराना वैर हो। इस छोटे से दरियाई शहर की परिक्रमा कर हम अपनी नई मंजिल की ओर बढ़ गए। लेकिन हां, तीन दिन इस शहर में आसानी से आनंद से गुजारे जा सकते हैं।



सोमनाथ से रूबरू

ऐतिहासिक सोमनाथ। पौराणिक सोमनाथ। देश की आन बान शान का प्रतीक सोमनाथ। समंदर जैसे अंजुली भर भर शिवलिंग पर जल चढ़ाता है। मुख्य मंदिर, जो लौहपुरुष सरदार पटेल के अथक प्रयासों से खड़ा हुआ। उसी भव्य रूप में। उतनी श्रद्धा के साथ।  मंदिर के ठीक दायी ओर ध्वंस अवस्था में अभी भी मौजूद है पार्वती मंदिर। गजनवी और औरंगजेब की कुत्सित चेष्टाओं का प्रतीक। लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल तत्व तक वे कभी नहीं पहुंच पाए। काश पहुंच जाते तो उन्हें इतिहास इस रूप में याद नहीं रखता। इतिहास के खलनायक। सोमवार का दिन था। महादेव के अद्भुत रूप के दर्शन का हम सभी को सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्रद्धालु मंदिर के चारों ओर महादेव में खोये हुए। अंतर्ध्यान। पीछे उफनता हुआ समंदर। महादेव से विदा लेकर हम युगांधर कृष्ण के मोह में खिंचते द्वारिका की ओर बढ़ चले। दरअसल द्वारिका जाने और न जाने को लेकर हमारे बीच मत विभाजन हो गया था। लेकिन हालात ऐसे बने कि बिना द्वारिका गए अहमदाबाद नहीं जाया जा सकता था। लेकिन यह यात्रा काफी मजेदार थी।

माधवपुर कृष्ण-रुक्मणी का विवाह स्थल

सोमनाथ से द्वारिका के बीच, सोमनाथ से लगभग पचहत्तर किलोमीटर दूर और पोरबंदर से पहले। माधवपुर का समंदर किनारा। जैसा नाम से मालूम हो जाता है। यहां भगवान कृष्ण और रुक्मणी का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए इस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर है। साफ-सुथरा समंदर तट। जैसे ही घनी आबादी के कस्बों को छोड़कर सड़क पर आगे बढ़ते जाते हैं अचानक से समंदर फिर से हमसे या हम समंदर से टकरा जाते हैं। लगभग निर्जन, शांत और उफनती लहरें। किसी भी सैलानी का न चाहकर भी यहां उतरकर कुछ पल गुजारने की इच्छा तीव्र हो जाती है। शायद कोई पौराणिक आशीर्वाद का प्रतिफल है। सड़क के किनारे रेतीले हिस्से को पार कर जैसे ही नीचे उतरते हैं विशाल, अथाह जलराशि आंखों में भर जाती है। लहरे जैसे इस समंदर पर किसी धावक की तरह हमारी और दौड़ती आ रही थी। लंबी लंबी फर्लांग भरते हुए। और सड़क किनारे की रेत में आकर जैसे पस्त हो जाती।
यह समंदर तट भगवान कृष्ण से जुड़ा हुआ है। पांच सहस्राब्दी और कुछ सदियां पीछे लौटिए। विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर से शिशुपाल से विवाह को इनकार कर चुकी भीष्मक की पुत्री रुक्मणी को लेकर कृष्ण चार सौ कोस की रथ यात्रा कर यहां रुक्मणी से विवाह कर उन्हें अभयदान देते हैं । विवाह संपन्न कर यहां से बलराम और यादव सेना के साथ पचास कोस द्वारिका अपनी राजधानी पहुंचते हैं।
हम भी समंदर की रेत में अपने पैरों के निशान छोड़कर और यहां की यादों को कैमरों में दर्ज कर द्वारिका की ओर बढ़ दिए। कृष्ण की सेना के पीछे पीछे।
माधवपुर समंदर तट पर जलज और तनव
माधवपुर समंदर तट पर
माधवपुर समंदर तट पर मनीष
माधवपुर समंदर तट पर उफनता समंदर

द्वारिका

द्वारिका। भेंट द्वारिका। हिंदुओं के चार धामों में एक । धार्मिक आस्था को छोड़िए। फिर से उस इतिहास की ओर चलते हैं, जिस पर अभी भी काफी शोध किया जाना शेष है। पांच हजार वर्ष पूर्व। समाज में शांति, नागरिकों को आतंक से बचाने और राष्ट्र की पश्चिमी सीमा को मजबूत करने के मकसद से दूरदृष्टा युगांधर श्री कृष्ण ने मथुरा से 655 मील अर्थात तेरह सौ किलोमीटर दूर अनजानी जगह पर समंदर के तट पर अपनी राजधानी की स्थापना की। एक सुरक्षा प्रहरी के रूप में।  क्योंकि उस वक्त भी अरब सागर के उस पार से आज की तरह ही दस्युओं से भरी नावें आने का खतरा मंडराता रहता था। इसके लिए द्वारिका में समंदर के बीच नाविक तैनात रहते थे।  कथित बुद्धिजीवियों ने जिसे महज कल्पना और पौराणिक घटनाक्रम ठहराकर नकारने की कोशिश की, पुरातत्व विशेषज्ञों ने  समंदर के भीतर डूबी द्वारिका की खोजकर उसे समय के सापेक्ष ऐतिहासिक तथ्य में बदल दिया है। द्वारिका स्थित मुख्य मंदिर से महज डेढ़ मील की दूरी पर भेंट द्वारिका। यहीं सुदामा ने दीन हीन दशा में अपने बाल सखा कृष्ण से भेंट की थी। यात्रियों को द्वारिका से भेंट द्वारिका तक ले जाने वाली ज्यादातर नावों के मालिक मुस्लिम है। भेंट द्वारिका में भी मुस्लिम बहुसंख्या में है। इसके बावजूद यहां का सामाजिक ताना-बाना काफी व्यावहारिक है। लोगों की रोजी-रोटी दुकान, नाव और मछली पालन से चलती है।

द्वारिका से भेंट द्वारिका के रास्ते में छोटी नावें

द्वारिका देश की पश्चिमी सीमा का आखिरी किनारा है। अगर यहां शाम के वक्त पहुंचते हैं तो सबसे पहले सनसैट पॉइंट पहुंचिए। समंदर के सीने में समाते लाल सूर्ख सूरज को देखना दिलचस्प अनुभव है।


Saturday, February 27, 2016

उन दिनों

उन दिनों
-    मुरारी गुप्ता



हाथों में लिपटी हुई चिकनी मिट्टी
कि महकते हुए शरबतों की दुकानें
चाक से उतरते दीयों की कतारें
दीयों से उठते खूशबू के बफारें
जेठ महीने की तपिस दुपहरी
कि दूर शहर से आई बर्फ की दुकानें
सिर पर साफा हाथों में भोपू
एक टेर से जी मचल उठता सबका
हरे, पीले, नीले चटक लाल गोले
सभी को चखना सभी को चखाना
चवन्नी का झगड़ा, अठन्नी का रोना
बड़ी मुश्किलों से बाराना होना।
होली का मेला, मेले में चूरण
चंदिया, खील, लड्डू, पपड़ी की दुकानें
लपलपाती नजरें, पर पैसे का रोना
यारों से उधारी, फिर कभी न चुकाना।
बारिश का पानी, टपकती दीवारें
टीन की चादर, चूल्हें की धुआएं
भीगे उपले गीली लकड़ियां
कैसे जलेगा जाने शाम को चूल्हा
मां की पेशानी पर चिंता का होना।
बेफिकरे हम बारिश में छपछप
शाम को आते घर लौटकर तो
मां कहां से जाने रोटी तोड़ लाती
करौंजे का अचार बथुए की भाजी
हमें खिलाती, आखिर में खाती।
टटोलें जरा तो, अंतर को यारां
क्या जिंदा है मां दिल में हमारे
वो नाजुक से लम्हे, हसीं पल सारे
घर के आंगन की मिट्टी मे लिपटी
शरारत की बातें, बारिश की रातें
मां के दो-चार कदम भी मिलेंगे
दिल पे पड़ी रेत हटाकर मिलेंगे
चलो उन लम्हों की वादियों में
आज फिर से जी लें जरा।

27 फरवरी 2016