Friday, October 4, 2019

पहाड़ी सुंदरी गुस्से में हैं

विभोम स्वर के अक्तूबर-दिसंबर अंक में यात्रा वृतांत



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Saturday, September 21, 2019


यात्रा/ मसूरी/ पर्यावरणीय चिंता
शैल सुंदरी गुस्से में है!

जिस तेजी से पहाड़ों की रानी मसूरी अपना रंग, ढंग और रूप बदल रही है, लगता है आने वाले कुछ सालों में पहाड़ों की रानी के हुस्न से मोहब्बत करने वाले इससे मुंह मोड़ लेंगे। और यह खुद भी लोगों से किनारा कर लेगी। पहली बार मसूरी साल 2015 में आना हुआ। उसके बाद अब यानी वर्ष 2019 के जुलाई महीने में फिर से यहां आने का अवसर मिला। मगर इन चार सालों में मसूरी ने जिस तेजी से नई शक्ल धारण की है, वह प्रकृति को प्यार करने वाले पर्यटकों के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। पहाड़ों की इस सुंदरी की वादियों की गंध को महसूस करने के लिए माल रोड पर कदम रखते ही डीजल की गाड़ियों से निकलने वाला गंध का चकराने वाला भभका आपका स्वागत करता है। यह पहाड़ी सुंदरी हर रोज न जाने कितनी बार इस गंध से रूबरू होती है। लगभग दो किलोमीटर लंबे माल रोड पर कदम बड़ी सावधानी से इसलिए रखने पड़ते हैं, कि कहीं पीछे से आ रही कोई गाड़ी आपके पैरों को कुचलती हुई न गुजर जाए।
माल रोड, हर पर्वतीय पर्यटन स्थल की यूएसपी यानी विशेषता होती है। यानी उस पर्वतीय स्थान को जानने, समझने, महसूस करने और यादों में बसाने के लिए ही इस रोड की खोज की जाती है। देश के हर पर्वतीय पर्यटन स्थल पर आपको माल रोड मिलेगा। और वही उस स्थल की पहचान भी होता है। कह सकते हैं वह उसकी आत्मा होता है। नैनीताल हो या फिर शिमला हर जगह माल रोड उस स्थल का सबसे आकर्षक बिंदु होता है। मगर, पिछले कुछ वर्षों में व्यवसायीकरण की खुली होड़ ने इन पर्वतीय पर्यटक स्थलों को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। इसके पीछे के खेल को समझना है, तो अलग से चर्चा करनी पड़ेगी।
चिंता सिर्फ यहां आने वाले पर्यटकों को अच्छा माहौल मिले, इतनी भर नहीं है। पर्यटक तो अच्छा वातावरण और माहौल के लिए किसी दूसरी जगह को भी तलाश लेंगे। लेकिन प्रकृति के साथ हम जो व्यवहार कर रहे हैं, लगता है हम उसके प्रतिशोध से लगभग बेखबर है। हम भूल जाते हैं केदारनाथ त्रासदी। हजारों लोगों की मौत। विस्थापन। विध्वंस। प्रकृति का रौद्र स्वरूप। हम भूल जाते हैं कि हर साल बढ़ती गर्मी, पिघलते ग्लैशियर, सूखती नदियां, तालाब, पोखर, कटते जंगल और बढ़ते प्रदूषण से मुकाबला करने के लिए हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास आने वाले सालों में पास कोई साधन नहीं बचेंगे। हम उन्हें क्या धरोहर सौंपकर जाएंगे? यह बड़ा सवाल है। जिसका जबाव खोजने की चिंता कहीं नजर नहीं आती।
फिर से मसूरी पर लौटता हूं। दो किलोमीटर लंबे माल रोड पर लगभग एक घंटे की चहल कदमी में लगातार डेढ सौ दो सौ मीटर लंबा एक भी पैच ऐसा नजर नहीं आता जहां से पहाड़ों की सुंदरी को ताजी सांस के साथ महसूस किया जा सकते। माल रोड के दायी और बायी, दोनों ओर पहाड़ों पर, उन्हें खोदकर, उन्हें गहरा कर, उनके ऊपर, उन्हें हटाकर और न जाने कैसे-कैसे तरीकों से आलीशाल होटल, रेस्त्रां, पार्किंग उगा डाले गए हैं। यह सही है कि हमने सुख सुविधाएं विकसित करने में कोई कमी नहीं रखी है। और स्थानीय निकाय, या सरकार को इससे भरपूर राजस्व भी मिलता होगा। आने वाला पर्यटक यहां एक दिन की बजाय दो दिन ठहरता होगा। मगर, क्या इस मसूरी के कंधों में इतना सब झेलने की वाकई में ताकत हैदूसरी ओर माल रोड पर पूरे दो किलोमीटर की लंबाई में हजारों की संख्या में छोटे-बड़े-बहुत बड़े वाहन दोनों दिशाओं से एक के पीछे एक लगभग धकियाते हुए रैंगते हुए आगे बढ़ते नजर आते हैं। संभव है इनमें बहुत से वाहन स्थानीय भी होंगे। चिंता की बात यह है कि क्या इस छोटी सी पहाड़ी सुंदरी के सीने में इतना सब कुछ सहने की क्षमता है! इतना कार्बन। इतनी गर्माहट।  कहीं ऐसा नहीं हो कि वह बिफर पड़े। और किसी दिन इंद्र देवता के सहयोग से अपना रौद्र और वीभत्स रूप धारण कर लें। उस वक्त हमारे पास बचने के कोई भी साधन काम न आएंगे।
चूंकी हिमालयन रैंज की पहाड़ियां अभी भी अपने अंतिम रूप में नहीं पहुंची हैं। इसे आसान शब्दों में कहें तो यहां के पहाड़ अभी तक उतने पक्के नहीं है, जितने की अरावली या दक्षिण की दूसरी पर्वतमालाएं। यहां की पहाड़ियां अभी तक कच्ची हैं। इसलिए हर बारिश में पहाड़ियां ढह जाती है। इसे अंग्रेजी लैंड स्लाइड कहते हैं, जो बारिश के दिनों में यहां और समूचे उत्तर पूर्व में आम बात है। इसलिए इन पर पक्का निर्माण कार्य बहुत अनुशासन के साथ करने की जरूरत होती है। पहाड़ों पर रहने वाले लोग जानते हैं कि पहाड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में पहाड़ों और खासकर हिमालयन रैंज की पहाड़ियों का सम्मान व्यवसायीकरण की आंधी में खत्म सा हो गया है। पर्यावरणविद मानते हैं और चेताते भी हैं कि जिस तेजी से मसूरी सहित हिमालयी पर्वतमालाओं के पर्वतीय कस्बों में में पक्का निर्माण कार्य हो रहा है, वह यहां के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बिलकुल अनूकूल नहीं है। आवश्यकता से अधिक वाहन का रेलमपेल और उससे निकलने वाला कार्बन और गर्मी इस खूबसूरत पहाड़ी की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। एक और तथ्य जो यहां नजर आता है वह है यहां के ड्रेनेज सिस्टम में फंसा प्लास्टिक, बोटल और कचरा। हमें फिर से केदारनाथ की त्रासदी अपने जेहन में रखनी चाहिए। कहने को तो एमडीएमसी यानी मसूरी देहरादून म्युनिसीपल कार्पोरेशन के तहत इस छोटे पहाड़ी कस्बे का ख्याल रखा जाता है। लेकिन सच्चाई यह कि आपको पावभर भी जामुन लेने हैं तो वह भी यहां प्लास्टिक की थैली में बहुत आसानी से और खुलेआम मिल जाएगा। हम अनुमान लगा सकते हैं कि दिन भर में कितना प्लास्टिक कचरा यहां एकत्र होता होगा। इस मामले में कुछ पर्वतीय स्थलों के प्रशासन ने अच्छा अनुशासन दिखाया है। और वहां प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंध किया है। क्या कम से कम अपने पर्वतीय धरोहरों को जिंदा रखने के लिए इस तरह का अनुशासन हम यहां लागू कर सकते हैं?
अब थोड़ी चर्चा, मसूरी के उन पहलुओं की जो प्रकृति के अलावा इसके इतिहास को भी जानने में दिलचस्पी रखते हैं। इसका लिखित इतिहास पढ़े बिना भी माल रोड से गुजरते वक्त स्थान स्थान पर ऊंचे स्थान पर एमडीएमसी की ओर से शीशे में बंद इस कस्बें की कुछ धरोहरों से यहां के इतिहास को जाना और महसूस किया जा सकता है। अंग्रेजी शासनकाल में उन्नीसवीं सदी के आखिर में इस कस्बे को पर्वतीय स्थल के रूप में पहचान मिली। उस वक्त यहां आने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या आती थी आवागमन के साधनों की। 1890 में एक भारतीय व्यापारी के दिमाग में इस समस्या के समाधान के लिए एक हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे का विचार आया। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इसके लिए उसे तत्काल अनुमति दे दी थी। ब्रिटिश हुकुमत ने उसे इसके लिए चार्लीविले होटल में किराए पर एक वर्कशॉप लगाने की भी इजाजत दे दी थी। उस वक्त की चार्लीविले होटल आज का लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी यानी नौकरशाहों को प्रशिक्षण देने का स्थल है। यह हाथ से खींचे जाने वाला रिक्शा जल्द ही यहां आवागमन का प्रमुख साधन बन गया था। बल्कि जल्द ही इसने स्टेटस सिंबल के तौर पर पहचान कायम कर ली। इन हाथ रिक्शाओं को खींचने वाले मजबूत युवा व्यक्ति को झंपनीज कहा जाता था। उनके लिए एक निर्धारित ड्रेस होती थी। शुरुआत में दो सीटों वाले रिक्शा को खींचने के लिए ब्रिटिश सरकार ने पांच झंपनीज को नियुक्त किया था। इसी तरह एक सीट वाले रिक्शा के लिए पांच लोगों को लगाया था। 1903 आते आते मसूरी के माल रोड पर तीन सौ से ज्यादा हाथ रिक्शा नजर आने लगे थे। माल रोड पर एक हाथ रिक्शा अभी भी बंद शीशे में रखा है, जो उस दौर को वर्तमान समय में ले आता है।
एमडीएमसी के लगाए ऐतिहासिक धरोहरों में ही यहां के सिनेमा इतिहास का भी पता चलता है। मसूरी में पहला सिनेमा हॉल कब शुरु हुआ होगा? सोचिए। यह 1912 का वक्त था। पिक्चर पैलेस के नाम से 1912 में मसूरी में पहला सिनेमा हॉल शुरू हुआ था। उसके बाद 1920 और 1930 के बीच यहां कई और भी सिनेमा घर खुले। इनमें रोक्सी सिनमा, रियाल्टो, केपिटल, मैजेस्टिक, बसंत और जुबली सिनेमा घर शुरु हुए। ये सभी माल रोड पर मौजूद थे और इनमें वर्षों तक बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्में लोग देखते रहे हैं। पिक्चर पैलेस उत्तर भारत का पहला ऐसा सिनमाघर था, जो बिजली से चलता था। इसे इलेक्ट्रिक पिक्चर पैलेस भी कहा जाता था। एमडीएमसी ने माल रोड के किनारे पर शीशे में बंदकर मैजेस्टिक सिनेमा का एक प्रोजेक्टर का प्रदर्शन कर रखा है, जो मसूरी के सिनेमा के खुशनुमा दिनों की याद ताजा करता है।  
मसूरी की जीवंत किंवदंती मशहूर अंग्रेजी कथाकार रस्किन बॉन्ड की चर्चा के बिना मसूरी की यात्रा अधूरी है। लगभग 85 साल के रस्किन अभी भी सक्रिय है। यहां गोद लिए परिवार के साथ रहते हैं। वे माल रोड पर मौजूद कैंब्रिज बुक डिपो पर हर शनिवार दोपहर तीन से चार के बीच अपने चाहने वालों और पाठकों से मिलते हैं। लोग उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं। उनके हस्ताक्षर वाली पुस्तकें लेते हैं। रस्किन से बेहतर मसूरी को कौन जानता होगा। उन्होंने अपने जीवन के पचपन साठ साल यहां गुजारे हैं। एक साक्षात्कार में चिंता जताते हुए कहते हैं, जिनके पास ठीक ठाक पैसा होता है, वे अब मसूरी को हेय नजरों से देखते हैं। वे लोग मसूरी या शिमला आने की बजाय मलेशिया या हांगकांग जाना पसंद करते हैं। सवाल है क्यों?
ऐतिहासिक धरोहरों और पुरानी यादों के नोस्टेल्जिया से बाहर आकर फिर से तीसरे पैराग्राफ की आखिरी पंक्ति से शुरू करता हुआ रस्किन बॉन्ड की चिंता को आगे बढ़ाता हूं। रस्किन बॉन्ड की चिंताओं आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में हमने हिमालयी सुंदरता के साथ किस तरह पशुवत व्यवहार किया है। और लगातार कर रहे हैं। वक्त अब भी है। हम अब भी हालात को नियंत्रण में ला सकते हैं। बस, मन और मस्तिष्क में से हिमालयी सुंदरता के आर्थिक शोषण के खयाल को हमेशा के लिए निकालना होगा। इनके व्यवसायीकरण में अनुशासन लाना होगा। और हां, यह भी जेहन में खयाल रखना होगा कि अगर हम ऐसा नहीं कर सके तो यह हिमालयी सुंदरी जब कभी अपने पशुवत व्यवहार पर उतरेगी तो दूर दूर तक मनुष्य और मानवता के चिह्न नजर नहीं आएंगे।  

(यात्रा 16


जुलाई 2019)


Tuesday, August 28, 2018

कश्मीर यात्रा/ चिनार ने कहा था

सोनमर्ग के रास्ते में बालटाल का अद्भुत दृश्य



चिनार जब आपको आमंत्रित करता है तो वह आपको ईरान नहीं बुलाएगा, क्योंकि उसका वंश तो ईरान से समाप्त हो चुका है। वह आपको कश्मीर की वादियों में आमंत्रित करेगा। सदियों पहले कश्मीर आए चिनार ने अब यहीं की आबो-हवा में अपना डेरा जमा लिया है। यूं मूल रूप से चिनार ईरान का वाशिंदा था। अपने अस्तित्व की हिफाजत के लिए जिस तरह अन्य सभ्यताओं से लोगों ने हिंदुस्तान में पनाह ली, फले, फूले और यहां का हिस्सा बने, उसी तरह सैकड़ो मीलों दूर ईरान से आकर चिनार कश्मीर की वादियों का सरताज, साक्षी और शोभा बन गया। उसकी कई पीढियां इन घाटियों की जड़ों में रच-बस गई हैं। वह भी कश्मीरीयत की पहचान बन गया है। प्राकृतिक रूप से देखें तो, वादियों की पहचान अब उसी से है। उसकी विशाल देह। कद काठी। उसके खूबसूरत झरते पत्ते। उसकी लंबी उम्र। उसके झरते पके पत्ते जब घाटी की धरती पर बिछ जाते हैं तो लगता है मानों घाटी अग्नि सिंदूर से नहा ली हो। हमने भी हवाओं में चिनार के संदेशों को महसूसा और एक ढलती शाम को वादी के आकाश का इस्तकबाल किया।

सैकड़ों सालों की उम्र लिए चिनार महसूसते हैं घाटी की सांसों को। उसकी कई पीढ़ियों ने कश्मीरियत को महसूस किया है। पंडितों, डोगरों, सिखों, सूफियों, अब्दुल्लाओं, मुफ्तियों, गिलानियों की सैकड़ों पीढ़ियों के बचपन से लेकर बुढ़ापे का वह गवाह रहा है। दहशत के साये में भी चिनार हवाओं के जरिए दूर-दूर बैठे सैलानियों को संदेश भेजता है इस दहशतगर्दी से खौफ खाने की जरूरत नहीं है, बंदूकों की गोलियां कभी इतनी ताकतवर नहीं होती कि वह इंसानों के जज्बे को छील भर सके। आइए, इन वादियों के साक्षी बनिये, जिनमें तुम्हारे आदि पुरुषों और महादेव ने अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को निखारा है। और इनमें एक शांति कायम की है। दहशतगर्दीवादी की नियत नहीं है। इसकी नियत शांति और अमन है। इसका शिव है। यहां का शैव है। यहां सूफी मत है। विश्वास कीजिए, यह शिव फिर स्थापित होगा। और धीरे धीरे हो रहा है।

गुलमर्ग के घास के मैदान में मास्टर तनव और इवा


तेरहवीं सदी में कश्मीर में शैव परंपरा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली गुरू लल्लेश्वरी या लाल देद की वाखें अभी भी वादियों में गूंजती हैं- हम ही थे, हम ही होंगे/हम ही ने चिरकाल से दौर किये/सूर्योदय और अस्त का कभी अन्त नहीं होगा/ शिव की उपासना कभी समाप्त नहीं होगी।

यह सच है कि कश्मीर में शिव की उपासना सदियों से हैं। घाटी शिव की तपस्या स्थली महाभारत के काल से भी पहले की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राजतरंगिणी, आईए-ए-अकबरी, नीलमत पुराण समेत कई ऐतिहासिक स्रोत इसकी पुष्टि करते हैं। मगर शिव की खोज में पंथनिरपेक्षता का तत्व डालने के मकसद से कुछ अलंबरदार इतिहासकारों ने रच दिया, अमरनाथ की गुफा की खोज कुछ भेड़ चराने वाले गुज्जर बकरवालों ने की। तब से यही इतिहास बार बार पढ़ाया जा रहा है। मानो, असल इतिहास बता दिया, तो कोई मजहबी तनाव हो जाएगा। यूं इतिहास कभी छिपा नहीं रह सकता। वक्त और पुर्वाग्रहों की खुरचन हटाते ही वह खुद ब खुद प्रकट हो जाता है।


छठी सदी में मीलों दूर समंदर किनारे केरल से आद्यगुरू शंकराचार्य भी यहां शिव की खोज में ही आए होंगे। शंकराचार्य ने यहां आकर धूनी रमाई थी। अपनी विशाल जलीय देह को समेटे डल के किनारे। डल के किनारे से सैकड़ों फीट ऊपर एक रमणीय पहाड़ी पर उनकी वह छोटी सी गुफा अभी भी मौजूद है, जहां वे शिवमय हुए थे। उसके पास ही मौजूद है भव्य और ऐतिहासिक शिवलिंग मंदिर। नीचे से ऊपर तक पूरा परिसर सुरक्षा बलों के आत्मबल से सुरक्षित है। पहाड़ी पर चढ़कर गाड़ी रुकने के बाद लगभग डेढ़-दो सौ सीढ़ियां चढ़कर मंदिर पहुंचते हैं। तनव इन सीढ़ियों के सरपट चढ़ गया, मगर महिला मोर्चा कमजोर रहा। मंदिर के घंट निनाद की ध्वनी तरंगे सैलानियों के साथ साथ डल के जिस्म को तरंगित करती हैं। यहां से पूरे श्रीनगर और वादी को महसूस कर सकते हैं, जिसे कुछ शायरों ने जन्नत का दर्जा दिया है। घंट निनाद को महसूस कर चिनार के पत्ते शिवोअहं बुदबुदाते हुए मुस्कराते हैं। उसे याद आता है अपना पैतृक घर ईरान यानी ऐतिहासिक पारस। पारस पर अरब, सिकंदर का आक्रमण। अरब आक्रमण के बाद तो जैसे ईरान की संस्कृति ही खत्म हो गई। उस संस्कृति के बचे खुचे अंश ईरान की इस्लामिक क्रांति ने समाप्त कर दिए अपने प्राचीन मंदिर, स्मारक और मूर्तियों को तोड़कर। चिनार को अफसोस होता है, कोई अपनी संस्कृति को खुद अपने ही हाथों कैसे खुरच खुरच कर खत्म कर सकता है। उसे हंसी आती है, देखिए, फिर भी अरब जगत उन्हें इस्लाम में शामिल करने के लिए तैयार नहीं है। और हर वक्त लड़ने के लिए तैयार रहते हैं। इससे तो अच्छा था, अपनी बची खुची संस्कृति को फिर से जिंदा करते। उस पर गर्व करते। जैसे इजराइलियों ने किया। चिनार हिंदुस्तान का ऐहसानमंद है, जिन्होंने उस वक्त जान बचाकर भागकर आए पारसियों को अपने पश्चिमी समंदर किनारे आसरा दिया। पाला-पोसा-बड़ा किया। अब तो चिनार की पीढ़ियों का भी ईरान में कोई अस्तित्व नहीं रहा। अपनी धरती छूटने का दुख तो है, मगर वादियों की आवो-हवा उसे रास आ गई है।

डल झील में शिकारा के दौरान चप्पुओं पर हाथ आजमाने की कोशिश। 



वह आमंत्रित करता है हर साल श्रद्धालुओं को। महादेव की इस पवित्र तपस्थली में। हजारों फीट ऊंचे पर्वतों पर। महादेव ने भी इसी धरा को अपनी तपस्थली के लिए चुना। कोई तो उद्देश्य रहा होगा महादेव का। सैकड़ों हजारों वर्षों से देश के हर हिस्से से श्रद्धालु महादेव की तपस्थली का पवित्र दर्शन करने आते रहे हैं। और चिनार की शाखाएं, पत्ता-पत्ता उनका इस्तकबाल करता रहा है, सदियों से। चाहे वह बालटाल का रास्ता हो या फिर पहलगाम का। कितनी खुशकिस्मत है चिनार की पीढ़ियां। सैकड़ों सालों से श्रद्धालुओं को अपने साये में सुस्ताने का सौभाग्य उन्हें मिलता रहा है।

इस बार यह सौभाग्य हमें भी मिला। अपने परिवार और साडु भाई श्री यश मंगल के परिवार के साथ तेइस जून की शाम को हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंच गए। सड़क मार्ग से आते तो शायद और भी आनंद आता। मगर नौकरी में छुट्टियों का टोटा और छोटे बच्चों के साथ यह मुमकिन नहीं था। श्रीनगर पहुंचने के बाद मित्र श्री सुनील कौल के सानिध्य से आकाशवाणी परिसर में मौजूद संन्यासी से खड़े विशाल चिनार के पेड़ तले कुछ पल रहने का सुख मिला। इससे पहले चिनार को सिर्फ फिल्मों से पहचाना करते थे। वह भी उनके झरते लाल पत्तों में घुले कथित इश्क से, जो फिल्म वालों ने घोल रखा है, फिल्म स्क्रीन को खूबसूरत दिखाने के लिए। खैर, खयाल आता है, इस चिनार ने भी वे भयानक, डरावनी, अलगावग्रस्त और रूह कांपने वाली आवाजें सुनीं होंगी। अब्दुल्ला और वीपी सिंह सरकार के नाक तले। घाटी से कश्मीरीयत तब ही पलायन कर चुकी थी। तब इबादत के पवित्र स्थलों से निकली उन भयानक आवाजों ने कश्मीरीयत का गला घोंट डाला था। कश्मीरीयत ने उन्हीं दिनों वहां से रुखसत करना शुरू कर दिया। अब कुछेक टुकड़ों में कश्मीरीयत को घाटी में महसूस किया जा सकता है। मगर इसकी असल तस्वीर देशभर में बिखरी पड़ी है। कश्मीरीयत सियासत के नारों से ज्यादा कुछ नहीं बची है घाटी में। राष्ट्रवाद से प्रेरित सियासत भी कश्मीरीयत के घाव को भरने में नाकाबिल साबित हुई है, अगर स्थानीय अल्पसंख्यकों (कश्मीरी पंडित) की मानें तो। दिखावा ज्यादा हुआ, काम बहुत कम। काम के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।  

महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र वसु ने पेड़ों की जीवंतता मापने के लिए अगर चिनारों पर प्रयोग किए होते तो यकीनन, उन्हें अलग तरह के नतीजे प्राप्त होते। अगर उन्होंने चिनारों की धड़कनों पर अपना क्रेस्कोग्राफ* लगाया होता, तो उन्हें घाटी के इतिहास की ऊंची-नीची-पथरीली-रपटीली घाटियों के ग्राफ बने नजर आते। घाटियां दिखने में खूबसूरत हैं। इतनी कि किसी भी सैलानी का दिल इन पर आ जाए। अखरोट, बादाम, केसर, धान की खेती किसी भी सैलानी को लुभा सकती है। चिनाब, सिंधु, लीथर जैसी नदियां, जीरो प्वाइंट पर बर्फ में बर्फ के खेलों का आनंद, ऊंची-ऊंची पहाडियां, सड़कों के दोनों ओर घने हरे भरे पेड़, धान के खेत, झरने और नदियां घाटी को प्राकृतिक सौंदर्य से संवारती हैं। मगर, इन वादियों में उतना ही दर्द भी पसरा है। चिनार की टहनियों के पास जुबान होती तो, वे बताती।

जून महीने के आखिर में घाटी में पर्यटन उतार पर होता है। इसलिए होटल, रेस्तरां, शिकारा की बहुत मारा मारी नहीं होती। आप इत्मीनान से श्रीनगर में इनका लुत्फ ले सकते हैं। 23 जून की शाम को लाल चौक पार करते हुए अपने पूर्व नियोजित रहवास में पहुंचे। डल हमें अपने नजदीक पाकर मचल रही थी, या हम उसे अपने करीब पाकर खुश थे। ये या तो वह जानती है या हम। हां, लाल चौक एकदम सफेद था उस दिन। किसी जिलानी ने कोई कॉल नहीं किया था उस दिन। उससे दो दिन पहले यहां जरूर बंद था। बंद की खबर पढ़कर साडु भाई ने चिंता जताई कि बंद में कश्मीर कैसे चलेंगे। कौल साब को फोन किया। उन्होंने आश्वास्त किया। बंद की चिंता मत करो। चले आओ। ये बंद यहां का हिस्सा है। और सचमुच बंद के तीसरे दिन, तेइस जून को लोगों का जीवन बड़ी शांति और अमन से गुजर रहा था। देर रात तक दुकानें खुली थी। सड़क पर ट्रैफिक किसी आम महानगर की तरह सरक सरक कर रेंग रहा था। झेलम श्रीनगर के बीचों बीच से गुजरती है। उसके ऊपर बने पुल पर सैंकड़ों वाहन अक्सर निकलने की जद्दोजहद में एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। खैर, इस पुल से कई बार गुजरने का मौका मिला और हर बार जाम में अटकना पड़ा। 

पहले दिन मुगलई बगीचों निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मेशाही बगीचे से रूबरू हुए। तीनों में एक बात जो कॉमन थी वह वे झरने जो घाटियों से निकलते हुए, बाग को गुलज़ार करते हुए डल में अपना अस्तित्व खो देते हैं।  मुगलई अंदाज में बने ये बगीचे मुगलकाल में दिल्ली की तपती मुगालफत और सुलगते आक्रोश से छुटकारा पाने के लिए मुगल बादशाहों की ऐशगाह हुआ करते थे। हालांकि दूसरी किस्म के कई पेड़, पौधे और घास यहां लगी है, मगर इन बगीचों की खूबसूरती चिनार से है, जैसे घर में बुजुर्ग के होने से। अगर चिनार इन बगीचों से हटा दिए जाएं, तो बगीचे विधवा हो जाएंगे। मुग़लो ने भले अपनी अय्याशियों को आरामदेह बनाने के लिए इन बगीचों का निर्माण करवाया हो, मगर फिलहाल बच्चों के लिए ये किसी खुशनुमा पार्क से कम नहीं है। बच्चे इनमें बहने वाले झरनों में अपना बचपन जीते हैं। खूब टोका टोकी के बावजूद मास्टर तनव ने इन झरनों का जमकर लुत्फ उठाया। इन बागों का असली मजा उसी ने लिया, बाकि हम तो पेड़ों की छावों में मोबाइलों में तस्वीरें ही उतारते रहे। तनव को इन तस्वीरों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे बस, उन झरनों में भीगना था। वह खूब भीगा, फिसला और नहाया। वह चाहता था कि उसके कपड़े गीले हो जाएं और फिर उसे नहाने की इजाजत मिल जाए। मगर वह बिना इजाजत भी नहाया। अब, बचपने को कोई अनुशासन कब बांध सका है।

खैर, बात डल झील की। जितना रोजगार सरकारों ने यहां के लोगों को नहीं दिया, उससे कई गुना रोजगार श्रीनगर में शांत भाव से पसरी खूबसूरत डल झील ने लोगों को दिया है।  शांत झील कितना रोजगार पैदा करती है, और दहाड़ते समंदर दो  वक्त की रोटी भी नहीं दे सकते। कितने वर्षों से ये खोखले समंदर वादियों में महज खोखले चिंघाड़ रहे हैं। जिनमें अक्सर सरहद पार के खारे समंदर भी मिल जाते हैं। कभी कभी इनकी आवाज़े दिल्ली दरबार और हैदराबाद हाउस तक सुनाई देती थी। और उनके इस्तक़बाल में सियासत बिछ जाती थी। अब हालात बदल रहे हैं। महादेव करें ये और तेजी से बदले।

पूरा श्रीनगर इसी डल के किनारे किनारे बसा हुआ है। शाम के वक्त डल किनारे टहलना अलग तरह का रोमांच पैदा करता है। कभी बालीवुड के सितारों से जड़ी डल अब थोड़ी उखड़ी उखड़ी दिखती है। डल की स्वच्छता आकर्षित करती है। डल में बीच बीच में मौजूद मिट्टी के टापुओं पर स्थानीय नागरिक सब्जियां पैदा करते हैं। ये सब्जियां बहुत स्वादिष्ट होती हैं।

हमारे शिकारा के केवट मंजूर अहमद के मुताबिक डल उनकी ज़िंदगी है। पांच साल का बच्चा भी सबसे पहले दोस्ती चप्पुओं से करता है। क्योंकि उनकी ज़िंदगी के ताउम्र दोस्त ये चप्पू ही होते हैं। मंजूर अहमद बताते हैं कि सियासत की सारी ताक़त तो कश्मीर में अलगाव के मुद्दे को ज़िंदा रखने में लग जाती है। यहां के नागरिकों को रोजगार और घाटी के विकास के बारे में चिंतन करने को किसको फुर्सत है। आम नागरिकों से उनका ज्यादा वास्ता नहीं है। वे कहते हैं, बेटे ने ग्रेजुएशन किया है। तीन लाख रुपये देने के वादे पर भी नौकरी नहीं मिली। अब डल में ही शिकारा चला कर अपनी ज़िंदगी गुजार रहा है। वह कुछ गुनगुनाता है। बीच बीच में अपने साथियों से कश्मीरी में बातचीत करता है।

टैक्सी के ड्राइवर बिलाल ने सियासत को अपने तरीके से समझाया। उसने कहा, घाटी में कोई पार्टी नहीं चाहती अमन हो। अगर एक पार्टी हार गई तो वह अलगाववाद को अपने तरीके से जिंदा रखती है। अलगाववादियों को सहलाती है। पत्थरों को इकट्ठा करके रखती है। यहीं चीजें उन्हें घाटी में जिंदा रखती है।  सियासत का यही दुर्भाग्य है। जिन बातों से उन्हें जिंदा नहीं रहना चाहिए, वे ही उनके जीवन स्रोत हैं। 

फिर से शिकारा के केवट की बात। डल में शहर की एक पूरी अर्थव्यवस्था चलती है। जैसे ही शिकारा झील में सौ डेढ़ सौ मीटर आगे बढ़ता है, मक्का वाला अपनी नाव लेकर आपके शिकारे से सटा देता है। आगे एक फल वाला आता है। एक प्लेट में पेश है-तरबूज, आम, लीची, केला, सेव के कटे टुकड़े। फिर आपकी डल यादों को अमर करने के लिए कुछ कश्मीरी पोशाकों के साथ एक नाव आती है। वह आपके शिकारा में ही आपको उन पोशाकों को पहनाकार आपकी तस्वीर ले लेगा। थोड़ा आगे बढियेगा तो नगीनशीं आपके मन मुताबिक अंगूठी तैयार कर देगा। 
अगर श्रीनगर बन्द है और आपको शॉपिंग करनी है तो डल आपके लिए बेहतरीन मॉल है। झील के भीतर टापुओं पर हर तरह की दुकान बंद के दौरान भी खुली मिलेगी। यहां आप काश्मीर के शॉल और दूसरी चीजें खरीद सकते हैं। झील के भीतर कई टापू हैं जहां जीवन भरपूर ज़िंदगी के साथ चलता है। यह झील अपने भीतर उगे कई टापुओं को जिंदा रखती हैं। हम एक ही शिकारे में घंटों घूमते रहे। तनव ने यहां भी अपने बचपने का आनंद लिया। पापा, मुझे चंपू (चप्पू) चलाना है। अरे साब, बच्चा है, आने दीजिए, मंजूर अहमद ने कहा। तनव एकदम खुश। वह शिकारे की सीटों के पीछे पहुंच गया। और वहां रखा अतिरिक्त चप्पू को चलाने लगा। उसे भ्रम हुआ कि उसके चप्पू चलाने से हमारी नाव आगे बढ़ रही है। वैसे, बच्चों में इस तरह के भ्रम पैदा करते रहने चाहिए। इससे उनका हौसला बढ़ता रहता है। 







यात्रा के दौरान अगर आवास व्यवस्था यानी होटल अच्छा मिल जाए, तो यात्रा काफी सुखद हो जाती है। इस मामले में हम खुशकिस्मत थे। हमें डल से महज सौ मीटर दूर एक बेहतरीन होटल मिल गया। इसकी खोज हमने वहीं श्रीनगर में इंटरनेट की मदद से की। मगर भोजन की समस्या सबसे बड़ी थी। क्योंकि लगातार पांच दिन बाहर खाना, बीमारियों को आमंत्रित करना है। इस मामले में भी किस्मत ने हमारा साथ दिया। उस पूरे होटल में हम ही दो परिवार थे। होटल कार्मिकों ने हमारे लिए हर रोज सुबह नाश्ता और शाम का खाना घर जैसा बनाकर दिया। प्रगति (साली साहिबा) ने उन्हें उत्तपम भी बनाना सिखा दिया। और हां, श्रीनगर की मिर्चियां लाजबाव थीं। देखने में मामूली मगर स्वभाव में तेज।

जून के आखिरी दिनों में अमरनाथ की यात्रा शुरू होने वाली थी। लिहाजा हर जगह फौज अनजाने खतरों के बीच श्रद्धालुओं की हिफाज़त के लिए मुस्तैद थी।  सोनमर्ग के रास्ते में चढ़ते ही एक बोर्ड आपका स्वागत करता है-फ़ौज आपकी सेवा में- सचमुच कितनी तसल्ली मिलती है इसे देखकर, पढ़कर और महसूस कर। जवान स्थितप्रज्ञ की तरह अपने हथियारों के साथ मुस्तैद रहते हैं। अगर चलती गाड़ी में उनको सलाम किया तो मुस्कुराते हुए सिर हिला देते हैं। हर डेढ़ सौ दो सौ मीटर की दूरी पर एक या दो जवान तैनात थे। अमरनाथ यात्रा का एक रास्ता बालटाल के रास्ते सोनमर्ग होते हुए जाता है। ये कम दूरी का है, मगर अनंतनाग से थोड़ा मुश्किल है। सोनमर्ग के रास्ते मे सिंधु नदी पूरे उफान से बहती हुई चलती है। इसके किनारे कई रेस्टोरेंट हैं। सोनमर्ग के रास्ते मे ज्यादातर रेस्तरां पंजाब के नाम पर है। खास बात यह कि सामिष खाने वाले प्रदेश में शुद्ध शाकाहारी खाने वालों के लिए सोनमर्ग से बेहतर कुछ नहीं है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय , पंजाबी , पहाड़ी हर तरह का शाकाहारी भोजन इस रास्ते मे है।
निशात बाग में तनव, ईवा और गीत।
शालिमार बाग में तनव और गीत


सोनमर्ग से तीस किलोमीटर आगे है जीरो पॉइंट। यानी लाइन ऑफ कंट्रोल से थोड़ा पहले। यहां पहाड़ के जिस्म से चिपकी बर्फ पर सैलानी बर्फ के खेलों का आनंद लेते दिख जाते हैं। इसी बर्फ के निचली तहों से बहता पानी आगे सिंधु नदी में घुलकर पाकिस्तान के रास्ते समंदर में विलीन हो जाता है। पानी भी कितना सफर करता है। जीरो पॉइंट से पहले बालटाल में अमरनाथ यात्रियों ने अपने डेरे जमा लिए थे। उनके रंग बिरंगे टैंटों को पहाड़ों से देखते हैं तो लगता है घाटी किसी दुल्हन सी सजी बैठी है।

बर्फ देखने का रोमांच इस बार प्रगति को ज्यादा था। और उससे ज्यादा था मास्टर तनव को। पहले सिर्फ सोनमर्ग तक जाने की योजना थी। सोनमर्ग से जीरो प्वाइंट तक जाने के लिए सोनमर्ग से अलग टैक्सी करनी होती है। इस टैक्सी के लिए जमकर मोलभाव होता है। यश साब की चतुराई से हमारा मोलभाव ग्यारह हजार से उतरकर सात हजार तक आ गया। हालांकि बाद में अफसोस हुआ, और खींचातानी करते तो यह पांच हजार से नीचे भी जा सकता था। खैर, जीरो पाइंट पहुंचकर बर्फ का रोमांच एक बार फिर आंखों, मन और मस्तिष्क में भर गया। टैक्सी ड्राइवर हमें बर्फ से बचाव के लिए कपड़े का आग्रह करता रहा, मगर हम अपने ही कपड़ों में बर्फ पर पहुंच गए। वहां स्लैज गाड़ी देखकर मास्टर तनव बिगड़ गया। मास्टर तनव को जब स्लैज गाड़ी पर नहीं बिठाया गया, तो उसने उस्तादी दिखाते हुए वहां पड़ी एक स्लैज गाड़ी को खींचकर ऊपर तक ले गया। शायद उस पर बैठकर अकेला ही फिसलना चाहता था। मगर इस दौरान एक स्लैज गाड़ी वाले से मोलभाव किया। तनव के साथ हमने भी उसका लुत्फ उठाया। ऐसी जगह पर, अगर कोई खतरा नहीं हो, तो बच्चों के भीतर के रोमांच को बाहर जरूर आने देना चाहिए। तनव स्लैज का दीवाना हो गया। स्लैज पर फिसलने के बाद वह फिर से किसी की खाली पड़ी स्लैज को ऊपर खींचने लगा। मजे की बात, कोई भी स्लैज मालिक उसे टोक नहीं रहा था। पूरे रास्ते में तनव और गीत ने रास्ते का खूब आनंद लिया।

गुलमर्ग लगभग सोनमर्ग जैसा है। यह सीमाई इलाका है। गुलमर्ग के मैदान रोमांचित करते हैं। यहां चौड़े, विशाल हरे मैदान मन को ठंड़क देते हैं। बस, घोड़ेवाले आपके पीछे न पड़े। मुश्किल ये है कि घोड़ेवाले आपको यहां चैन से घूमने नहीं देंगे। वे आपको मजबूर कर देंगे कि आप उनके घोड़ों पर बैठकर ही गुलमर्ग का आनंद ले सकते हैं। मगर इस बार हम अड़े रहे। घोड़े की तरह। मगर यहां भी मास्टर तनव की घोड़े पर बैठने की जिद मचल गई। आखिर दो सौ मीटर की दूरी तक घोड़े की सवारी कर उसने अपनी जिद पूरी की।

गुलमर्ग के हरेभरे मैदान में बीचों बीच एक शिवमंदिर है। देश के अन्य हिस्सों से आने वाले सैलानी इस मंदिर के दर्शन के लिए जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में उतनी तादाद में खाने के रेस्टोरेंट नहीं है जितने सोनमर्ग के रास्ते में है। इस रास्ते में सेव के कई बगीचे हैं। हालांकि उस वक्त सेवें जवान नहीं हुई थी, उन पर हरियापा छाया हुआ था। बीच में कालीन और शाल के कई कारखाने दिखे। गुलमर्ग के रास्ते में कश्मीर घाटी को रेल मार्ग से जोड़ने वाली पटरियां नजर आती हैं। संभव है जल्द ही घाटी तक का सफर रेलमार्ग से हो सकेगा।    

पहलगाम यानी बैल गांव अनंतनाग जिले का हिस्सा है। अमरनाथ यात्रा का यह मुख्य रास्ता है। यह रास्ता आगरा-बीकानेर राजमार्ग जैसा आरामदेह है। एकदम सपाट और चौड़ी सड़क। आधारभूत ढांचे के स्तर पर हुए काम का यह बेहतरीन प्रतीक है। अनंतनाग श्रीनगर से लगभग 60-65 किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते से जम्मू का रास्ता निकलता है। वैसे अमरनाथ यात्रा के लिहाज से देखें तो यह ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का रास्ता है, जहां से पांच हजार वर्ष पहले पांडवों ने महाप्रयाण किया था।

 इसी से शोपियां का रास्ता निकलता है। अलगाव की चिंगारियां इस इलाके में ज्यादा सुलगाई जाती हैं, लिहाज़ा सेना के जवान और स्थानीय पुलिस के जवान हर सौ मीटर पर मौजूद है। इन जवानों पर हर वक़्त किसी अनजाने खतरे का साया रहता है। मगर मौत को ये अपनी मुट्ठी में रखते है। सैलानियों को सेना के जवान बायपास रास्तों से नहीं जाने देते। सुरक्षा कारणों से। हमारे साथ हमारे मित्र और स्थानीय रहवासी सुनील कौल साब थे। उन्होंने कश्मीरी में उनसे बात की, मगर जब उन्होंने हमारे चेहरे देखे तो बाईपास रास्ते से जाने से एकदम मना कर दिया। इस रास्ते के दोनों और अखरोट के पेड़ और लीथर नाला साथ साथ चलते हैं। 

पहलगाम की यात्रा के दौरान बीच में पड़ता है पंपोर इलाका। यह दक्षिण कश्मीर के आतंक सक्रिय जिला पुलवामा का हिस्सा है। पुलवामा जिला केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर में सबसे ज्यादा केसर पुलवामा के पंपोर क्षेत्र में होती है। और दुर्भाग्य से पंपोर में अलगाव के बीज भी खूब पनपते हैं। कैसा विरोधाभास है। पूरी घाटी में आम लोगों में सियासी पार्टियां केसरिया के प्रति दुर्भावना भरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। घाटी में सियासी दलों और अलगाववादी संगठनों को सबसे ज्यादा खौफ या नफरत केसरिया रंग से है।  इतना फोकस अगर केसर पर किया होता तो इस इलाके की आर्थिक हालात और भी ज्यादा मजबूत होती। खैर। 

कश्मीर में आपने कहवा नहीं पिया, तो समझिए आपसे कुछ न कुछ छूट गया। स्थानीय कहवा तरोताजा करने के लिए काफी है। पहलगाम से लौटते वक्त सूखे मेवों की एक दुकान पर कुछ सूखे मेवे खरीदने के बाद दुकानवाले अब्दुल डार ने कहवा आफर किया। स्थानीय चाय और सूखे मेवे मिश्रित कहवा एक अलग तरह का बेहतर स्वाद जुबाँ पर चिपका देता है। यूं तो कश्मीर में वाजवान यानी बकरे के गोश्त से बना खास व्यंजन यहां की खासियत है, मगर निरामिष का संस्कार उस ओर जाने से रोकता है। और भी खास बात, रेगिस्तान का फल तरबूज यहां बहुतायत में पाया जाता है। हर फल वाले की दुकान पर तरबूज मिल जाएगा।

पहलगाम के रास्ते में ऐतिहासिक और पौराणिक स्थान मट्टन है। यहां भगवान सूर्य का मंदिर है। उसके आगे बहुत साफ सुथरे तीन कुंड हैं। इनमें श्रद्धालु मछलियों को दाना डालते हैं। यहां अभी कुछ मंदिरों का निर्माण कार्य चल रहा है। मट्टन का जिक्र कई पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है।

मट्टन से आगे निकलने पर रास्ते में उजड्ड से खड़े निर्वासित कश्मीरी पंडितों के घर, जो अब भी खौफ, नफरत, अलगाव के इतिहास को समेटे है,  मन को व्यथित कर देते हैं। सड़क किनारे अभी भी बेखौफ खड़े विशाल घरों के खोखले पिंजर, टूटी खिड़कियां और दरवाजे, आंगनों में उग आए जंगली पौधे घरों की तात्कालिक बिवशता, असहाय, बेसहारापन जैसी हालत बयां करते हैं। जिस वक्त राष्ट्रवादी पार्टी के समर्थन से वीपी सिंह गठबंधन सरकार चला रहे थे, उस वक्त कश्मीरी पंडितों को भद्दी और गंदी चेतावनियों के साथ अपने आशियानों से बेदखल किया जा रहा था। कितने मट्टू, कौल, सप्रुओं की यादें इन टूटी खिड़कियों और दरवाजों से चिपकी हैं। दुर्भाग्य से, जिस पीढ़ी की इन घरों में पैदाइश हुई, उन्हें इनमें मरना तक नसीब नहीं हुआ। नई पीढ़ी जो दिल्ली, जम्मू और दूसरी जगहों पर जन्मी, पली और बढ़ी हुई है, वक्त की धार के साथ-साथ उनका भावनात्मक लगाव इन टूटे घरों से कितना रहा है, कहना मुश्किल है। मगर, दिल्ली और श्रीनगर की सियासत के चेहरों पर ये बिखरे घर कई बदनुना दाग छोड़ देते हैं।



हमारे साथ, हमारे मार्गदर्शक के रूप में चल रहे श्री सुनील कौल के परिवार को भी 90 के दशक में घाटी में अपने विशाल घर को छोड़कर  जम्मू का रुख करना पड़ा। तब उनकी उम्र 16-17 की थी। उन्हें वो मंजर अब भी हूबहू याद है। मगर मैंने उन्हें कुरेदा नहीं। उन जख्मों को कुरेदने से बेहतर है उनकी साफ सफाई कर उनमे मलहम भरा जाए। अपने ही घर के आंगन में टैंट लगाकर रहना किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। विकसित लोकतंत्र में यह अस्वीकार्य है। कुछ आवाजें उठ रही हैं। मगर एक बात तय है बिना शक्ति भक्ति संभव नहीं है। पंडितों को सिर्फ सियासत के बल पर ही नहीं, बल्कि अपने भुजबल और आत्मबल से अपने खोये अतीत को हासिल करना होगा। बिल्कुल इजराइल के यहूदियों की तरह। बिना ज़मीन के अस्तित्व के भी यहुदियो ने दो हज़ार साल तक अपने भीतर बिना जमीन और आसमान वाले राष्ट्र को ज़िंदा रखा। जब भी मिलते तो कहते अगली बार यरुसलम मिलेंगे।  क्या पंडित भी श्रीनगर में मिलने, आशियाना संवारने, और शक्ति का नया केंद्र बनाने के वादे के साथ  मिलने की हिम्मत करेंगे।  संभव है आने वाले दिनों में उनके उजड़े घरों में फिर से गृह प्रवेश की शहनाई बजे। चार दिन बाद एक अलसाई सुबह में भीगी वादियों को छोड़ हम वापस लौट आए। लौटते-लौटते भीगते चिनारों ने हमसे वापस आने का वादा लिया। उसके मौन शब्दों ने कहा, देखिएगा, जल्द ही घाटी में गृहप्रवेश की शहनाइयां गूंजेगी। तुम फिर लौटकर आना सैलानी।
उम्मीद है कश्मीर की अगली यात्रा किसी कश्मीरी पंडित मित्र के  गृह प्रवेश के निमंत्रण पर होगी।