Saturday, November 29, 2014
Tuesday, November 18, 2014
समाजवाद, श्वान और हुमायु
शुरू होकर पालम तक
बस नंबर ७९४
बिना हॉर्न दिए मौन शांति से
वाहनो के रैले को चीरते हुए
दौड़ती जा रही है
सड़क के किनारे
मौत का घूँट पी रहे
दरख़्त साँस भर रहे हैं
ऑक्सीजन कम है
उनके फेफड़ों में
बीच चौराहो में बची जगहों पर
ईंट से बने चूल्हो की राख
ठंडी हो चुकी है
शाम की आस में
डूबी आँखे
साथ में श्वान
आगे के दोनों पैरों के बीच
किसी विचार में मगन
सिर को रख चिंतित हैं
हुमायूँ और पितामह भीष्म
दोनों चिंतित है
एक दफ़न हैं मकबरे में
और पितामह राह दिखला रहे हैं
अभी भी माइलस्टोन पर चिपके हुए
लोधी एस्टेट में चमकती दुकाने
टाइप चार, पांच और छह
एक के ऊपर एक रखे हुए
सरकारी कोठिया
लगता ही नहीं पीछे
अधूरी आस को छोड़ कर आये हैं
लोधी एस्टेट की बिखरी रौशनी
का थोड़ा कतरा काश
अधूरी उम्मीदों की आँखों में
बिखर सकता
खैर, ये समाजवाद की बाते हैं
जो कि राजनैतिक है
समाजवाद
सिर्फ राजनैतिक शब्द है
समाज से इसका वास्ता
काम ही है
Wednesday, October 22, 2014
उतर गया बुखार
रात भर वह ज्वर से अकुलाता रहा। पूरा शरीर तेज ज्वर से तप रहा था। दिवाली पर मौसम में आए अचानक बदलाव ने उसके शरीर पर भी असर कर दिया था। जैसे जैसे अंधेरा बढ़ता गया, उसके शरीर का ताप भी बढ़ता गया। धनतेरस की शाम को ज्वर की हालत में ही उसने बहुत सारी फूलझड़िया, अनार और जमीन चक्र का लुत्फ भी उठाया था। हालांकि सारे पटाखे मैंने ही चलाए थे। रात में उसके सिर से लेकर पैर तक पूरी तरह भट्टी की तरह तपने लगे। हमने सोचा सुबह किसी डाक्टर को दिखाकर दवा दिला देंगे। सुबह दफ्तर जाने के लिए सवा पांच बजे उठा। ये महाशय भी उठे। और साथ में दफ्तर जाने की जिद करने लगे। ज्वर अभी भी बना हुआ था। जिद करने लगा। ऐसी स्थिति में ज्यादा डांटा भी नहीं जा सकता। तभी श्रीमतीजी के मन में फूलझड़ी सा विचार फूटा। उन्होंने कहा, आओ, पटाखे चलाते हैं। सुबह के छह बज रहे थे। सारे पड़ोसी सो रहे थे। फूलझड़ी, अनार और जमीनचक्र क्या निकाले, उसके तो मजे हो गए। अनार की रोशनी में सारा बुखार गायब। उछल उछल कर जमीनचक्र की चिरमिराहठ में जोर जोर से चिल्लाने लगा। एक एक कर फूलझड़ी, अनार और जमीन चक्र चलते गए और उसका सारा बुखार उतर गया।
Wednesday, December 21, 2011
खामोश ब्लॉग में कुछ पल ठहरा आज
बहुत दिन हुए, ब्लॉग ख़ामोशी से मेरी कलम का इंतज़ार करता रहा, कि शायद कभी अपनी वेवजह की व्यस्त जिन्दगी में से मेरे लिए कुछ पल, कुछ शब्द, कुछ श्याही निकालेगा। आज मैंने वो ख़ामोशी तोड़ी, कुछ फिजूल की बाते लिखने के लिए। कि अरुणाचल से जाने का वक़्त धीरे धीरे नजदीक आ रहा है। दिन, महीने, साल ओर फिर साल २०११ का दिसंबर का महिना भी बीता जा रहा है। महीनो की पीठ पर दिन ओर साल के कंधे पर बैठ महीने कब गुजर जाते हैं, पता ही नहीं चलता। एक एक दिन करके डेढ़ साल गुजर गए।
अरुणाचल मेरे लिए इतना सुकून भरा रहेगा, मैंने नहीं सोचा था। आने से पहले मेरी कल्पनाओ में थोड़ी बेचैनी थी। मगर डर बिलकुल नहीं था। बन्दरदेवा दरवाजा (अरुणाचल का एंट्री पॉइंट ) पार करते ही वह बैचेनी भी सिरे से गायब हो गयी। हर दिन तनव के साथ नयी ताजगी के साथ गुजर रहा है। दुआ करो ऐसा ही चलता रहे।
यूँ भी अरुणाचल ने मेरे लिए कई स्मरणीय बाते, घटनाये जोड़ी हैं। यहाँ मेरा परिवार पूरा हो गया (तनव का जन्म )। मेरे माता-पिता ओर मेरे धर्म माता-पिता भी इस बहाने यहाँ की सैर कर गए, वर्ना चार धामों की यात्रा की सूची में अरुणाचल का जिक्र नहीं होता। उत्तरप्रदेश के लोग जरुर परशुराम कुंड में नहां जाते हैं. भारत सरकार को इनक्रेडिबल नोर्थ ईस्ट के लिए मुझे शुक्रिया कहना चाहिए। मैंने बैठे-बिठाये राजस्थान में नोर्थ-ईस्ट एक्सप्लोर कर दिया। फ़ोन पर तो रोज ही अपने मित्रों के साथ एक्सप्लोर करता हूँ। हाँ, वो आये या न आये इसकी मैं गारंटी नहीं लेता।
फिलहाल यहाँ राजनितिक शांति है। उठापठक बंद है। मगर आने से पहले से यहाँ रहने वाले अपने किसी इष्ट मित्र से फ़ोन जरुर करना कि कही बंद तो नहीं है। जो कि राजधानी में बहुत कोमन है। हाँ, मगर अरुणाचल है बहुत खूबसूरत। ऐसे कह लो कि हिमाचल प्रदेश को दाये तरफ से खींच दिया है। फिर ये शिवजी की तपस्या स्थली है। तो जाहिर है हर प्रकार के प्राणी यहाँ पाए जायेंगे। मगर वो यहाँ की खूबसूरती में इजाफा ही करते हैं।
अच्छा, अब बंद करता हूँ, शायद मेरा ब्लॉग आज मुझे अपने करीब पाकर धन्य हो गया होगा। करीब तो रोज होता हूँ, मगर उसकी तरफ नजर उठाकर देख भी नहीं पाता हूँ। अच्छा दोस्तों, राम राम।

Friday, June 24, 2011
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