Tuesday, August 31, 2010

राजनीति, मौसम और मयखाने


अरुणाचल संभवतया देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां विधानसभा में कुछ निदॆलियों को छोड़ दें, तो अपोजिशन के नाम पर शून्य की स्थिति है. यानी सरकार के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं। मगर हां, यहां गली, नुक्कड़, कालोनी, ढाणी, समूदाय, शहर, कालेज, कमॆचारी के नाम पर संगठनों की भरमार है। और खास बात ये कि अपनी किसी न किसी मांग को लेकर ये संगठन सरकार को आए दिन धमकाते रहते हैं। और राज्य सरकार भी उनकी मांगों के लिए वाकायदा कमिटी बैठाती है, उनकी मांगों को पूरी शिद्दत से सुनती है. ये संगठन सरकार को सीधे चेतावनी देते हैं. शहर, राज्य को बंद करने की धमकी देते हैं.
अभी कुछ दिन पहले राज्य के पूवॆ मुख्यमंत्री गेगांग अपांग को हजारों करोड़ों रुपए के पीडीएस घोटाले में गिरफ्तार क्या कर लिया, आदि समुदाय ने उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ राज्य में विरोध प्रदशॆन करने की धमकी दे दी। यहां आपको बताता चलूं कि गेगांग अपांग देश का एक मात्र ऐसा मुख्यमंत्री रहा है जो लंबे समय तक लगभग २३ सालों तक इस पद पर रहा है। वे आदी समूदाय से आते हैं। जाहिर है आदी समूदाय के लोगों का गुस्सा होना जायज है। राज्य में १६ प्रमुख आदिवासी समूदाय है। उप आदिवासियों की संख्या सैकड़ों हैं। सबके अपने नेता है। अपने संगठन हैं। अपनी मांगे हैं। अपने विधायक हैं। अपने मंत्री हैं। अपने समूदाय के एक शीषॆ नेता को गिरफ्तार होते देख आदी समूदाय का भड़कना स्वाभाविक है। गेगांग अपांग कांग्रेसी नेता भी हैं। कहा जाता है कि राज्य सरकार में उनके विरोधियों की अच्छी खासी तादाद है। समूदाय का दावा है कि उनकी गिरफ्तारी राजनैतिक है।
और हां, अभी अरुणाचल और असम के सीमावतॆी इलाके में कुछ जगह को लेकर दोनों राज्यों में तनाव बढ़़ा हुआ है। आपस में फायरिंग भी हुई। एक अरुणाचल की ओर का व्यक्ति घायल भी हो गया। जिसको लेकर और भी ज्यादा तनाव हो गया। असम के छात्र संगठनों ने अरुणाचल जाने वाले रास्तों को जाम कर दिया. यानी अरुणाचल आने वाला राशन के तिरप जिले में आने वाला राशन बंद। इसे अंग्रेजी में इकोनोमिक ब्लोकेड कहते हैं, लगा दिया. कई दिनों तक यह जारी रहा. अरुणाचल की सरकार ने असम सरकार से, अरुणाचल के छात्र संगठनों ने असम के छात्र संगठनों से इस आथिॆक नाकेबंदी को हटाने का आग्रह किया. बात बनी. कुछ नहीं बनी. राज्य के वित्त मंत्री को आसाम वहां के मंत्रियों के साथ मिलकर बैठकें कीं, तब कहीं जाकर यह नाकेबंदी हटी। खबरें हैं कि अभी तनाव कुछ कम हुआ है. पिछले लगभग पंद्रह दिनों से रेडियों की पहली सुरखी यह खबर बन रही है. मुझे भी अब यहां की कुछ बातें समझ में आने लगी हैं.
इधर मौसम बेवफा सनम की तरह है। सुहाने मौसम में मन को खुश करते हुए निकलो, बीस कदम बाद सूरज आपको पसीना-पसीना कर देगा. सूरज का मूड देखकर बिना छतरी निकले यहां घाटे का सौदा है, मैं कड़क धूप की बात नहीं कर रहा.हम तो वैसे भी ४०-४५ डिग्री के बीच रहने वाले हैं, कब आपके ऊपर कोई बादल का टुकड़ा आकर छोटे बच्चे की तरह चिढ़ाता हुआ आप पर बरस जाए, कहा नहीं जा सकता.
मयखाने को पसंद करने वालों के लिए यह स्वगॆ है. अपने यहां तो पान की दुकान भी कम से कम तीन सौ कदम पर मिलेगी, मगर यहां हर पचास कदम पर मनपसंद ब्रांड की शराब मिल जाएगी. दरअसल शराब का धंधा यहां फायदे का सौदा है. बेचने वाले और पीने वाले दोनों के लिए ही. यहां शराब पर टैक्स नहीं है. मगर कुछ साथी, जिनके लिए यह मस्ती का पैमाना है, मिजोरम में फंस गए हैं. मिजोरम इस लिहाज से सूखा प्रदेश है. खैर, मैं उन नामुराद दुकानों को देखकर आगे बढ़ लेता हूं. मगर देखता जरूर हूं. देखकर अपने साथियों के लिए आहें भरता हूं. काश उनकी जगह मैं पी पाता. यां यहां से एक पाइप लाइन से सप्लाई कर पाता. अफसोस दोस्तो.
फिर से पहले पैरा की बात पर लौटता हूं. तीन सितंबर से राज्य विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो रहा है. कवरेज के लिए जाना है. जिग्यासा है. कवरेज करने की. इससे भी ज्यादा इस बात को जानने की कि बिना अपोजिशन के विधानसभा की तस्वीर कैसी होती है....
कोई नए समाचार मिलने तक....
राम राम

Saturday, August 21, 2010

हरा-भरा-मनोरम अरुणाचल



हरी-भरी पहाड़ियों, दरियाओं, बांस के पेड़ों और गहरी खाइयों को पार करती हुई बस जब अरुणाचल प्रदेश के बांदरदेवा में रुकी, तो लगा कि शायद यही ईटानगर होगा। सुबह के लगभग सवा चार या साढ़े चार बजे होंगे। आंखों में नींदे अभी जागी ही थीं। आंखें मसलते हुए खिड़की से बाहर देखा, तो लोग मंजन कर रहे थे। मैंने मोबाइल की घड़ी में वक्त देखा। अभी साढ़े चार ही बजे थे। मगर सूरज लुकाछिपी करता हुआ बादलों में आ बैठा था। मैं यही सोच रहा था कि अभी जयपुर में लोग रात की नींद का आनंद ले रहे होंगे, और यहां लोगों ने सुबह के दैनिक कामों को निपटा दिया। खैर, यहां सभी को अपना इनर लाइन परमिट दिखाना पड़ता है। यानी कि अरुणाचल क्यों आए। इसके लिए बाकायदा दिल्ली, गुवाहाटी से पास बनता है। खैर मेरे पास सरकारी पहचान पत्र था, इसलिए कोई मुश्किल नहीं हुई। बस रवाना हुई।
लगभग ३५ किलोमीटर तक पहाड़ियों, खाइयों, दरियाओं और बादलों की ओट में बस आगे बढ़ रही थी। पिछले चार महीने से यहां लगातार बारिस हो रही है, लिहाजा सड़कों के हालात बहुत अच्छे नहीं है, मगर बस के चालकों को इससे कोई फकॆ नहीं पड़ता। दिल्ली-जयपुर के सपाट मागॆ पर इतनी रफ्तार से बसें नहीं दौड़ती, जितनी तेजी से यहां पहाड़ी सड़कों पर बसें दौड़ती हैं। गुवाहाटी से ईटानगर का लगभग चार सौ किलोमीटर का सफर साढ़े सात घंटे में। खैर, अब तक ईटानगर आ चुका था।
छोटा सा शहर है। हरी-भरी पहाड़ियों की गोद में बसा हुआ। और पहाड़ियां चौबीसों घंटे बादलों से गुफ्तगु करती रहती हैं। जब ये दोनों बहुत खुश होते हैं, तो सारा नगर बूंदों से नहा उठता है। इसलिए यहां हर हाथ में छाता नजर आ जाएगा। मालूम नहीं चलता कि कब पहाड़ियां और बादल आपस में नाराज होकर अलग हो जाए और उनके बीच सूरज आकर जलाने लगे, और कब इकट्ठे होकर बूंद बरसाने लगे। हमने भी दो रंगीन सी छतरियां खरीद ली हैं। मगर आदत नहीं है साथ में लेने की, इसलिए खूब भीगना भी पड़ता है। छतरियां यहां ज्यादा महंगी नहीं है। मगर हां, कीमते आपको कम करवानी पड़ेंगी। चार सौ रुपए का सामान आप थोड़ा बारगेनिंग करके दौ सौ में ले सकते हैं। अच्छी बात ये कि हमारे यहां के लोगों के विपरीत कीमते करवाने और खरीदकर ले जाने के बाद ये लोग आपको गाली नहीं देते। बल्कि उतनी ही मोहब्बत से कीमते कम करते हैं। शहर थोड़ा महंगा है। इसकी वजह यह है कि यहां किसी भी वस्तु का उत्पादन नहीं होता। सारा सामान आसाम से आता है। अभी परसों की बात है, सब्जी मंडी में हमारी (यहां हमारी से तात्पयॆ मैं और मेरी पत्नी प्रेरणा से है) नजर एक फूलगोभी पर पड़ी। सोचा आज फूलगोभी बनाई जाए। एक फूल उठाया, लगभग आधा किलो का होगा। मैंने बीस रुपए का नोट निकाला। उससे पूछा- कितना हुआः बोला- सर पचास रुपए। अब तक फूल गोभी को अपने थैले में जमा कर चुके थे। इसलिए फिर से लौटाना भी अच्छा नहीं लगा। पचास का नोट थमा चुपचाप एक दूसरे का मुंह देखते हुए चले आए। आटो वाले भी पांच आठ से दस किलोमीटर के चार सौ रुपए से कम में फटकने नहीं देते। मगर सवारी आटो और खुली सीटों वाली टाटा सूमो चलती है, जिनमें किराया दस से बीस रुपए तक है।
यहां की राजनीति- दूसरे राज्यों से एकदम अलग। अपोजिशन यहां नहीं है। जो कुछ भी धरना, प्रदशॆन, विरोध, बंद, और रैलियां निकलती हैं, वे सब छात्र संगठनों की जिम्मेदारी हैं। इसके अलावा यहां कई जातियों में बंटे वनवासी बंधु हैं। उनके संगठन है। उनकी अपनी मांगे हैं।
फिर लौटता हूं। मेरा स्टेशन लगभग आठ सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर है। एकदम ऊंची नहीं है। मगर एक बार चढ़ने में सिर से लेकर पीठ तक पसीने में तरबतर हो जाती है। उतरना उतना ही आसान है। घर के चारों और हरियाली है। केलों के पेड़ है। बांस के पेड़ है। केलों पर इन दिनों हरे-हरे केले भी आ रहे हैं। केले के भाव यहां दजॆनों में है। यानी कि ३० रुपए से लेकर चालीस रुपए दजॆन। यहां केले पीले नहीं होते। हरे केले ही मीठे होते हैं। दूसरे तमाम फल बहुत महंगे हैं।
सबसे अच्छी बात, जो किसी भी उत्तर भारतीय को आकषिॆत करेगी, यहां आने के बाद आपको नहीं लगेगा कि आप कहीं और आ गए। संभवतया अरुणाचल प्रदेश ही पूवॆोत्तर का एकमात्र ऐसा राज्य हैं, जहां लोग आपसी बातचीत में हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। बाहरी लोगों से नहीं, बल्कि आपस में भी बात करने के लिए हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। यहां अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही आधिकारिक भाषाएँ हैं। पहले लोग आपसी बातचीत के लिए असमिया इस्तेमाल करते थे। वैसे यहां हर बनवासी समूदाय की अपनी बोली है। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा रेडियो स्टेशन से ग्यारह स्थानीय बोलियों में बुलेटिन प्रसारित होते हैं। आज का बुलेटिन यहीं खत्म करता हूं।
जय हिंद. जय अरुणाचल

Friday, July 16, 2010

चलो भारी मन से जुदा हो जाएं

आखिरकार मन के किसी कोने में छिपे उस दर्द के अब बाहर आने का वक्त हो ही गया। लगभग छह महीने पहले इस साल के शुरुआत में जब आईआईएमसी में आईआईएस के फाउंडेशन कोर्स के लिए देशभर के साथी लोग एकत्र हुए थे, तो मन में ख्याल आया था कि जब छह महीने बाद यहां से जुदा होंगे, तो उस पीड़ा को कैसे सहन कर पाएंगे। मगर पिछले बीस दिनों से एक-एक कर साथी छूटते जा रहे हैं। मैं कल यानी 17 जुलाई को आईआईएमसी के हास्टल से रुखसत हो जाऊंगा। हास्टल में अब सिर्फ सुदीप्तो, मानस, रितेश, मनोज, जेना, सुंदरियाल, निशात और मधु बचे हैं। इनमें से निशात, जेना और सुंदरियाल की चूंकी पोस्टिंग दिल्ली में हैं, लिहाजा उन्हें यहीं रहना है। और मैं 26 जुलाई को देश के एक खूबसूरत हिस्से ईटानगर जाने की तैयारी में जुटा हूं। नई जगह जाने का मन में निश्चित रूप से उत्साह और उमंग है, मगर पिछले छह महीने से परिवार का हिस्सा बन चुके अपने भाईयों जैसे दोस्तों से बिछुड़ना बहुत बुरा लग रहा है। पता नहीं अब जिंदगी के कौनसे मुकाम पर इन तमाम दोस्तों से मुलाकात होने का मौका मिले। सभी साथियों ने अपना-अपना सामान पैक कर लिया है। सभी के टिकट हो चुके हैं। दोस्तों ने शुक्रवार को खूब खरीदारी भी की और रात को पार्टी भी मनाई।
साथ ही एक दुखद खबर, हमारे अपने साथी शुभारंजन के पिताजी की असमय मृत्यु ने हम सब साथियों को दुख से भर दिया। ईश्वर शुभा को इस संकट की घड़ी में हिम्मत प्रदान करें। वे घर में सबसे बड़े हैं, लिहाजा घर की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर हैं। और अक्टुबर में उसकी शादी की तारीख भी तय थी। मगर जो कछु होय, राम रचि राखा.........
ऱाम राम.....

Sunday, June 13, 2010

भोजन के बहाने हुए इकट्ठा


मैंने पिछले ब्लाग में लिखा था कि क्लास रूम स्टडी समाप्त होने के बाद अब हम लोगों को मिलने के बहाने ढूंढ़ने पड़ेंगे। मगर सफी ने एक शगुफा छोड़ा कि क्यों नहीं फेमिली गेट-टुगेदर किया जाए, जिसमें सभी परिवार वाले यानी जिनकी शादी हो चुकी है, जो उनकी पत्निया दिल्ली में रहती है, उनके लिए। फिर दुगाॆ से बात हुई। तो योजना को विस्तार देते हुए यह तय हुआ कि क्यों नहीं सभी साथी इस कायॆक्रम में शामिल हों। सभी से हिस्सेदारी ली जाए। यह हिस्सेदारी लेने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मैंने सभी से पैसे इकट्ठे करने शुरु किए। शुरुआत की एफ-५ से। जगह तय हुई हास्टल का मैस। गणेश को मैन्यू की लिस्ट सौंपी। दिन तय हुआ ११ जून शुक्रवार शाम साढ़े छह बजे का। सात बजे साथियों ने कामन रूम में आना शुरु किया। मुझे लग रहा था कि शायद ३५ का आंकड़ा मुश्किल से पहुंचेगा। मगर आठ बजते-बजते २५ के करीब साथी और कईयों की धमॆपत्नी भी आ पहुंची थी। अब लगा कि यह आयोजन ठीक-ठाक ढंग से हो जाएगा। आनंद प्रधान सर भी आ चुके थे। मगर हमारी कुछ साथी शायद किसी वजह से नहीं आ पाई। उन वजहों का अभी तक खुलासा नहीं हुआ। अरविंदजी भी आ चुके थे। अब इंतजार हो रहा था हमारी कोसॆ डायरेक्टर शालिनी नारायण मैडम का। लगभग साढ़े नौ बजे वे आई। इसके बाद खाना शुरु हुआ तो रात साढ़े ग्यारह बजे तक चला। सभी ने इस दौरान मीडिया युनिट में अपने अटैचमेंट के अनुभवों को बांटा।
अब देखते हैं अगला बहाना क्या बनता है।

एक कविता---काबिलियत

छूटने का गम भी अजीब है
छूटने से पहले और छूटने के बाद
कई दिनों तक
रिसता रहता है
मन में यादों के तूफानों से
मगर यही नियती है
जुड़ना है
छूटना है
फिर
आगे बढ़ जाना है.
क्यूं टीस पालते हैं
यादों की
ये सताएंगी, रुलाएंगी
बेहतर है इन यादों का
यहीं पिंडदान कर दें
या आंखों के रस्ते
गंगा में बहा दें.
मगर
इतना आसान भी कहा हैं
ये तो अपेंडिक्स की तरह
चिपकी रहती हैं जेहन में
काट कर कौन फेंके
और काटना भी कौन चाहता है
इनकी रंगीनियतों से
जिंदगी कितनी हसीन होती है
ये तो वो जानता है
जिसके जेहन में
कुछ इंच जगह है
यादों को बसाने के लिए
मगर
यादों में बसने के लिए भी तो
कुछ काबिलियत चाहिए न
आजकल इसी काबिलियत को
इकट्ठा करने में जुटा हूं।

Wednesday, May 5, 2010

क्लासों का दौर खत्म, मिलने के लिए अब ढ़ूंढ़ेंगे बहाने...

जनवरी 4 से आईआईएमसी में एक बार फिर से यानी लगभग छह साल बाद छात्र के रूप में अपने भीतर छिपे छात्र को फिर से जिंदा किया। आईआईएस (भारतीय सूचना सेवा) के सभी प्रशिक्षुओं को छह महीने के प्रशिक्षण के लिए आईआईएमसी के हरे-भरे वातावरण में पढ़ने के लिए भेजा गया। रहने के लिए हॊस्टल दिया गया। पूरे चार महीने छात्र जीवन का भरपूर आनंद लेने के बाद 4 मई को हमारी छुट्टी हो गई। दरअसल हमारी क्लास रूम स्टडी अब अपने आखिरी पड़ाव पर आ पहुंची है। अब हमें मीडिया यूनिट में प्रेक्टिकल जानकारी के लिए जाना होगा। इस बीच खुशखबर यह है कि हम सभी अधिकारियों को कामनवेल्थ गेम में तीन महीने के लिए अटैच किया जा रहा है। उम्मीद है वहां हमें नए माहौल में काम करने का मौका मिलेगा। शायद बहुत कुछ नया सीखने को मिलेगा। सभी साथी इस बात से काफी खुश हैं। मगर ज्यादातर साथी लोग क्लास खत्म होने से निराश है। निराश इसलिए नहीं है कि क्लास नहीं हो पाएंगी...पढ़ नहीं पाएंगे, बल्कि निराश इसलिए हैं कि अब आपस में मिलने के बहाने तलाशने पड़ेंगे। बात क्लास की हो रही थी। ...क्लासों के दौरान कई फैकल्टी ऐसी भी आईं जिन्होंने हम पर मानसिक दबाव बनाते हुए हमसे कहा- विहेव लाइक आफिसर। मगर हम थे कि- आफिसर बनने को तैयार नहीं थे। इस दौरान पत्रकारिता की बहुत सी पुरानी बातों को नए अंदाज में सीखा। कुछ न्यूज लैटर बनाए। हालांकि आईआईएमसी के कंप्यूटरों में हिंदी फोंट की दिक्कतों के बावजूद हमने जैसे-तैसे करके न्यूज लैटर निकाले। इस दौरान हमने वीडियो कैमरे और स्टिल कैमरों पर भी हाथ साफ किए। एक डाक्युमेंट्री तैयार की। आईआईएमसी में पढ़ने आने वाले गुट निरपेक्ष देशों के छात्रों के ऊपर। उनके अनुभवों को इस डाक्युमेंट्री में शामिल किया। लगभग 24 विदेशी छात्र-छात्राओं के इस गुट में कईयों से अच्छी खासी दोस्ती भी हो गई। पिछले अप्रेल महीने की आखिरी तारीख को वे भी हमसे रुखसत हो गए।
इन दिनों हमारे बहुत से साथी लोग अभी तक अपने न्यूज लेटरों में उलझे हैं। कई लोग रेडियो असाइनमेंट तैयार कर रहे हैं। एक बात जो मैं कहना भूल गया. रेडियो टाक और रेडियो ड्रामा भी हमने तैयार किया। मैंने रेडियो टाक को रिकार्ड करवाया। इसी दौरान हमने एक कार्यक्रम भी किया,जिसका हर पहलू हम सभी साथियों ने तैयार किया। नाटक, गीत, शेरो-शायरी, सालसा जैसी तमाम विधाओं के जरिए हमने यहां कई यादों को संजोया और ये यादें तमाम उम्र हमारे जेहन में सूखे पत्तों की माफिक बनी रहेंगी। एक तस्वीर भी आपको यहां देखने को मिलेगी।
इन दिनों गरमी तेजी से पड़ रही है। लिहाजा सभी साथी लोग हास्टल के कमरों में एसी की ठंडी छाव में चैन की नींद निकाल रहे हैं। जब तक कुछ नई ताजा नहीं मिले...हम भी चैन लेते हैं।
जय-जय

Friday, April 9, 2010

आदिवासी नहीं वनवासी बंधु हैं वे


हमारा इतिहास विदेशी लोगों ने वह भी पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर लिखा है। बचाकुचा इतिहास हमारे देश के कथित बौद्धिक और वामपंथियों ने लिखा, जिन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि राम और कृष्ण इस देश में हुए या नहीं। और यहां के निवासियों के जीवन में ये महापुरुष कितना महत्व रखते हैं। अभी तक हम उसी इतिहास को ढोते चले आ रहे हैं। उनके दिए शब्दों को हम अपनी भाषा में इस्तेमाल करते हैं। ऐसा ही एक शब्द है आदिवासी, जो हमें इन दरिंदे इतिहासकारों ने दिए। मैं इन्हें दरिंदा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जो किसी समाज और देश की संस्कृति को तोड़ने या विकृत करने का काम करता है वह दरिंदा नहीं तो क्या है। हमारे लिए जंगलों में या वनों में रहने वाले बंधु आदिवासी नहीं है। आदिवासी का अर्थ होता है मूल निवासी। तो क्या बाकी लोग और कहीं से आए। इन्हें हमारे वैदिक साहित्य में अत्विका या वनवासी कहा गया है। बहुत ही साधारण सी बात है....यानी जो वनों में या जंगलों में रहते हैं वे वनवासी और जो नगर में रहते हैं नगरवासी। उन्हें क्यों वृहत हिंदु समाज से अलग करके देखा या दिखाया जा रहा है।
वे हमारे बंधु हैं। हमारा अटूट हिस्सा है। और बरसों से हमारे साथ रह रहे हैं। हां उनकी अपनी परंपराएं हैं, जो एक जगह वर्षों से रहने से बन जाती हैं। उनके अपने रीति-रिवाज है। वे अपने लोक देवताओं को मानते हैं। लेकिन उनके दिल में भगवान शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा उसी तरह बसती है जैसे उनके लोक देवता। उनकी जड़ वैदिक धर्म से जुड़ी है। वे हमारे ही समाज के एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्हें हमसे अलग किया ही नहीं जा सकता। विकास की गति में जरूर वे पिछड़ गए हैं। लेकिन उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने का काम हमारा है। हमारे समाज का है। देश का है। एक साजिस तहत उन्हें हिंदु समाज से अलग करके बताया जा रहा है। महात्मा गांधी ने हमारे इन बंधुओं को गिरिजन कहकर संबोधित किया था। 19 सदी के आरंभ में इन्हें इसाई मिशनरियों ने ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया था। लेकिन अब वक्त है कि समाज के अग्रणी संगठन और बौद्धिक लोग उन्हें अपने लेखन में शामिल करें। लेकिन कथित रूप से दलित साहित्यकारों की तरह नहीं। जिन्होंने सनातन धर्म के वृहत हिस्से में बाकी समाज के प्रति अपने लेखन से नफरत घोल रखी है। इसलिए समाज के बीच कड़ी बनकर काम करना होगा।
लेकिन यह विषय मैने इसलिए यहां उठाया कि कल यानी 8 अप्रेल 2010 को शाम को मैं न्यूज चैनल पर समाचार सुन रहा था तो अचानक मेरा रिमोट लेमन टीवी पर रुक गया। वहां छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के द्वारा सताए वनवासियों पर कोई स्टोरी चलाई जा रही थी। खास बात यह थी इस स्टोरी में बार-बार उन लोगों को वनवासी कह कर संबोधित किया जा रहा था। यह सुनकर अच्छा लगा कि न्यूज चैनलों में अभी तक शब्दों को लेकर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। काश सभी चैनल वाले ऐसा सोचें। अभी कुछ दिन पहले एक चैनल पर एक स्टोरी बताई जा रही थी जिसमें आदिमानव होमोसेपियंस को आधुनिक मानव का पूर्वज बताकर हर बात कही जा रही थी। जब हम मानते हैं कि हमारे पूर्वज आदिमानव नहीं है। यह सिर्फ एक सिध्दांत है, जिसे पश्चिम ने दिया है। हम उस सिध्दांत को ही सच मानकर उसके आधार खुद को क्यों साबित करें।
चैनल पर बोला गया हर शब्द बहुत कीमती होता है और उसके गहन अर्थ होते हैं. कृपया अपनी स्क्रिप्ट को आखिरी रूप देने से पहले उसके हर पहलू पर गौर करें।
नमस्कार।