
अरुणाचल संभवतया देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां विधानसभा में कुछ निदॆलियों को छोड़ दें, तो अपोजिशन के नाम पर शून्य की स्थिति है. यानी सरकार के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं। मगर हां, यहां गली, नुक्कड़, कालोनी, ढाणी, समूदाय, शहर, कालेज, कमॆचारी के नाम पर संगठनों की भरमार है। और खास बात ये कि अपनी किसी न किसी मांग को लेकर ये संगठन सरकार को आए दिन धमकाते रहते हैं। और राज्य सरकार भी उनकी मांगों के लिए वाकायदा कमिटी बैठाती है, उनकी मांगों को पूरी शिद्दत से सुनती है. ये संगठन सरकार को सीधे चेतावनी देते हैं. शहर, राज्य को बंद करने की धमकी देते हैं.
अभी कुछ दिन पहले राज्य के पूवॆ मुख्यमंत्री गेगांग अपांग को हजारों करोड़ों रुपए के पीडीएस घोटाले में गिरफ्तार क्या कर लिया, आदि समुदाय ने उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ राज्य में विरोध प्रदशॆन करने की धमकी दे दी। यहां आपको बताता चलूं कि गेगांग अपांग देश का एक मात्र ऐसा मुख्यमंत्री रहा है जो लंबे समय तक लगभग २३ सालों तक इस पद पर रहा है। वे आदी समूदाय से आते हैं। जाहिर है आदी समूदाय के लोगों का गुस्सा होना जायज है। राज्य में १६ प्रमुख आदिवासी समूदाय है। उप आदिवासियों की संख्या सैकड़ों हैं। सबके अपने नेता है। अपने संगठन हैं। अपनी मांगे हैं। अपने विधायक हैं। अपने मंत्री हैं। अपने समूदाय के एक शीषॆ नेता को गिरफ्तार होते देख आदी समूदाय का भड़कना स्वाभाविक है। गेगांग अपांग कांग्रेसी नेता भी हैं। कहा जाता है कि राज्य सरकार में उनके विरोधियों की अच्छी खासी तादाद है। समूदाय का दावा है कि उनकी गिरफ्तारी राजनैतिक है।
और हां, अभी अरुणाचल और असम के सीमावतॆी इलाके में कुछ जगह को लेकर दोनों राज्यों में तनाव बढ़़ा हुआ है। आपस में फायरिंग भी हुई। एक अरुणाचल की ओर का व्यक्ति घायल भी हो गया। जिसको लेकर और भी ज्यादा तनाव हो गया। असम के छात्र संगठनों ने अरुणाचल जाने वाले रास्तों को जाम कर दिया. यानी अरुणाचल आने वाला राशन के तिरप जिले में आने वाला राशन बंद। इसे अंग्रेजी में इकोनोमिक ब्लोकेड कहते हैं, लगा दिया. कई दिनों तक यह जारी रहा. अरुणाचल की सरकार ने असम सरकार से, अरुणाचल के छात्र संगठनों ने असम के छात्र संगठनों से इस आथिॆक नाकेबंदी को हटाने का आग्रह किया. बात बनी. कुछ नहीं बनी. राज्य के वित्त मंत्री को आसाम वहां के मंत्रियों के साथ मिलकर बैठकें कीं, तब कहीं जाकर यह नाकेबंदी हटी। खबरें हैं कि अभी तनाव कुछ कम हुआ है. पिछले लगभग पंद्रह दिनों से रेडियों की पहली सुरखी यह खबर बन रही है. मुझे भी अब यहां की कुछ बातें समझ में आने लगी हैं.
इधर मौसम बेवफा सनम की तरह है। सुहाने मौसम में मन को खुश करते हुए निकलो, बीस कदम बाद सूरज आपको पसीना-पसीना कर देगा. सूरज का मूड देखकर बिना छतरी निकले यहां घाटे का सौदा है, मैं कड़क धूप की बात नहीं कर रहा.हम तो वैसे भी ४०-४५ डिग्री के बीच रहने वाले हैं, कब आपके ऊपर कोई बादल का टुकड़ा आकर छोटे बच्चे की तरह चिढ़ाता हुआ आप पर बरस जाए, कहा नहीं जा सकता.
मयखाने को पसंद करने वालों के लिए यह स्वगॆ है. अपने यहां तो पान की दुकान भी कम से कम तीन सौ कदम पर मिलेगी, मगर यहां हर पचास कदम पर मनपसंद ब्रांड की शराब मिल जाएगी. दरअसल शराब का धंधा यहां फायदे का सौदा है. बेचने वाले और पीने वाले दोनों के लिए ही. यहां शराब पर टैक्स नहीं है. मगर कुछ साथी, जिनके लिए यह मस्ती का पैमाना है, मिजोरम में फंस गए हैं. मिजोरम इस लिहाज से सूखा प्रदेश है. खैर, मैं उन नामुराद दुकानों को देखकर आगे बढ़ लेता हूं. मगर देखता जरूर हूं. देखकर अपने साथियों के लिए आहें भरता हूं. काश उनकी जगह मैं पी पाता. यां यहां से एक पाइप लाइन से सप्लाई कर पाता. अफसोस दोस्तो.
फिर से पहले पैरा की बात पर लौटता हूं. तीन सितंबर से राज्य विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हो रहा है. कवरेज के लिए जाना है. जिग्यासा है. कवरेज करने की. इससे भी ज्यादा इस बात को जानने की कि बिना अपोजिशन के विधानसभा की तस्वीर कैसी होती है....
कोई नए समाचार मिलने तक....
राम राम